धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो,
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो..............,
वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में,
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................,
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं,
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............,
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है,
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Friday, May 21, 2010
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जल चुके ख्वाब तब वो आग बुझाने आये, एक नए ढंग से वो चोट लगाने आये.
मॉम के पुल से गुज़र कर जाना था हमें, और वो शमा बनकर साथ निभाने आये..!
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