Wednesday, March 31, 2010

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है


वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,

हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है


करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत,

देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है


रहबरे राहे मुहब्बत, रह न जाना राह में

लज्जते-सेहरा न वर्दी दूरिए-मंजिल में है


अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़

एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है ।


ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,

अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,

आशिकों का आज जमघट कूचा-ए-कातिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


है लिये हथियार दुशमन ताक में बैठा उधर,

और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर,

खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है,

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


हाथ जिन में हो जुनून कटते नही तलवार से,

सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से,

और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है,

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


हम तो घर से निकले ही थे बाँधकर सर पे कफ़न,

जान हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम.

जिन्दगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल में है,

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


यूँ खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार,

क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,

होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें कोई रोको ना आज

दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून

तूफ़ानों से क्या लड़े जो कश्ती-ए-साहिल में है,

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है


- बिस्मिल आजिमाबादी

ख्वाब

" वो जानती है , उसका आकाश
कितना छोटा और सिमटा है ;
उसे पता है ,
एक फटी चादर और दो रोटियों में
रात नहीं कटती ;
और ......
वो यह भी समझती है कि ,
न आज कुछ बदला था
न कल कोई नयी सुबह होगी ,
इसलिए तो......
बस " मुट्ठी भर ख्वाब " लेकर ही
सोती है वो रोज़ ......

नज़्म

नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी

रचनाकार: गुलज़ार

Tuesday, March 16, 2010

थोड़ी है..थोड़ी है

अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है

लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है

मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है

हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है

जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है

सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

ऐतबार

आदतन तुम ने कर दिए वादे
आदतन हम ने ऐतबार किया

तेरी राहों में हर बार रुक कर
हम ने अपना ही इन्तज़ार किया

अब ना माँगेंगे ज़िन्दगी या रब
ये गुनाह हम ने एक बार किया

ज़िंदगी

ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
क़ाफिला साथ और सफर तन्हा

अपने साये से चौंक जाते हैं
उम्र गुज़री है इस कदर तन्हा

रात भर बोलते हैं सन्नाटे
रात काटे कोई किधर तन्हा

दिन गुज़रता नहीं है लोगों में
रात होती नहीं बसर तन्हा

हमने दरवाज़े तक तो देखा था
फिर न जाने गए किधर तन्हा

Saturday, March 13, 2010

गैरों के घर रोशन करने की है आदत
चुपचाप इसी धुन में जलता है आईना

हक....

ऐ हमनशीं चल कहीं और चल ,
इस चमन में तो अब अपना गुज़ारा नहीं !
बात होती गुलों तक तो सह लेते हम ,
पर अब तो काँटों पर भी हक हमारा नहीं !!

Thursday, March 11, 2010

ज़िन्दगी..........क्या है कुछ भी तो नहीं

Zindagi tune lahoo leke diya kuch bhi nahin

Tere daaman mein mere waaste kya kuch bhi nahin,

Mere in haathoN ki chaaho to talaashi le lo,
Mere haathon mein lakiron ke siwa kuch bhi nahin,

Humne dekha hai kai aise khudaon ko yahan
Saamne jinke wo sach much ka khuda kuch bhi nahin,

Yaa khuda ab ke ye kis rang se aayi hai bahaar
Zard hi zard hai pedon pe hara kuch bhi nahin,

Dil bhi ik zid pe ada hai kisi bachche ki tarah
Ya to sab kuch hi ise chaachiye ya kuch bhi nahin,

Hsate Haste

Tut gaya umeedo ka silsila intezar karte karte,
Jane kab fannah ho gaya humara dil unse pyar karte karte.
Uski bewafai ko bhulakar dil wafai nibhata raha,
Udhar usne mohabat ka janaja nikala hsate haste.........:)

Mazaa kuch aur hai

Paane se khone ka mazaa kuch aur hai,
Band aankhon me rone ka mazaa kuch aur hai,
Aansoo bane lafz aur lafz gazal,
Aur uss gazal me aap ke hone ka mazaa kuch aur hai

Acha guzra huwa kuch waqt bohot yaad aaya..

Aaj Rootha huwa ik dost bohot yaad aaya
Acha guzra huwa kuch waqt bohot yaad aaya..

Meri aankho k her ik ashk pe ronay wala
Aaj jab aankh yeh roee tOu bohot yaad aaya..

Jo mere dard ko seene main chupa laita tha
aj jab dard huwa mujh ko bohot yaad aaya..

Jo meri aankh main kajal ki tara rehta tha
aaj kajal jo lagaya tOu bohot yaad aaya...

Jo mere dil k tha qareeb faqat us ko hi
aaj jab dil nay bulaya tOu bohot yaad aaya...

Mere jevan ki her khushi main wohi tha,
aaj jab yaad woh aaya tOu bohot yaad aaya...

Agar tum milne aa jao

Ye duniya bhar ke jhagde, ghar ke kisse, kaam ki baaten. Bala har ek tal jaye agar tum milne aa jao

Wednesday, March 10, 2010

मेरी दीवानगी

साथ जीने मरने की कसमे खाते थे
अब मिलने से भी कतराते है वो ...
पलो मे छोड़ दिया हाथ मेरा
सात जन्मो साथ बतलाते थे वो
मेरी दीवानगी पर मर मिटने वाले
अब बड़े अंदाज से बेगाना बता मुस्कराते है वो