एक मेरा दामन अकेला, ख़ुशियाँ हज़ाराँ कहाँ रक्खूँ,,
सदियों से जो साथ मेरे था, रंज बेचारा कहाँ रक्खूँ .
(Ek meraa daaman akelaa,khushiyaan hazaaraan kahaan rakhun,,
Sadiyon se jo saath mere thaa, ranj bechaaraa kahaan rakhun.)
सुखों की बारिश ऐसी बरसी,ग़म का छप्पर भीग गया,
जिस्मों-रूह में बेहद ठन्डक , दिल का शरारा कहाँ रक्खूँ .
(Sukhon ki bearish aisi barasi,gam ka chhappar bheeg gayaa,,
Jismon rooh me behad thandak, dil kaa sharaaraa kahaan rakhun.
उजियारों से वहशत खा गए , यार मेरी तन्हाई के,,
अन्धियारों-वीरानों को तरसूँ, चांद-सितारा कहाँ रक्खूँ .
(Ujiyaaron se vahashat khaa gae, yaar meri tanhaai ke,,
Andhiyaron–viraanon ko tarasoon,chaand sitaaraa kahaan rakhun.)
गुल सूखे-गुलशन उजड़े, बुलबुल कब की दफ़्न हुई,,
अबके मौसम झूम के आई, सब्ज़े-बहाराँ कहाँ रक्खूँ .
(Gul sookhe-gulshan ujade,bulbul kab ki dafna hui,,
Abake mausam jhoom ke aai, sabze-bahaaraa kahaan rakhun.)
चाँदी का चम्मच मुँह में, और कभी मुफ़्लिसी का समाँ,,
इसपे क्या खुश होऊँ, बहती वक़्त की धारा कहाँ रक्खूँ .
(Chaandi ka chammach muh me, aur kabhi muflisi kaa samaan,,
Isape kyaa khush houn, bahatee vaqta ki dhaaraa kahaan rakhun)
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो, ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो.............., वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में, क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................, पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं, अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............, फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है, वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Saturday, November 21, 2009
Saturday, November 07, 2009
कभी सुबह से कभी सहर से लड़ा करती थी,
कभी सुबह से कभी सहर से लड़ा करती थी,
मुद्दतें हुयी एक शमा यहाँ जला करती थी,
क्या बात हुयी के आज सर-ए-शाम बंद हो गयी,
एक खिड़की जो औकात-ए-सहर खुला करती थी,
सिमटा है दिल क्यों? अब के बार इस तूफ़ान में,
गरजते थे बादल, बिजली पहले भी गिरा करती थी,
नाउम्मीदी इस दिल से दूर ही रहा करती थी,
खता मेरी ही थी जो दुनिया से दिल लगा बैठे,
ये कमबख्त जिन्दगी कब किसी से वफ़ा करती थी,
मैं काश ये कह सकता "मुझे याद कीजिये"
कभी मेरी याद जिनकी धड़कन हुआ करती थी,
देखो आज हम उनकी दुनिया में शामिल ही नहीं,
अपनी हाथो की लकीरों में बसना चाहता हूँ
इस बार कुछ ऐसा मैं चाहता हूँ
तुम को अपना बनाना चाहता हूँ
भुला के अपने सारे गम,
तुझे दिल से अपनाना चाहता हूँ
तुम्हे तुम्हारी इजाज़त से
अपने दिल में बसाना चाहता हूँ
दुनिया को सर-ए-आम दिखाना चाहता हूँ
कहीं कबुलियत की घड़ी ना आ जाये
तुम्हे हर दुआ में मांगना चाहता हूँ
हो जाओ तुम मेरी और मैं तुम्हारा
हर पल हब ये ही अहसास चाहता हूँ,
तुम से ही बस मोहब्बत की है मैंने,
अपनी सारी जिन्दगी तुम्हारे संग बिताना चाहता हूँ,
हक से कहता हूँ तुम्हे मैं अपना,
बस तुमसे भी ये कहलाना चाहता हूँ,
ज़िन्दगी का कोई और ही किनारा होगा
देखो पानी मे चलता एक अन्जान साया,
शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा
कौन रो रहा है रात के सन्नाटे मे
शायद मेरे जैसा तन्हाई का कोई मारा होगा
अब तो बस उसी किसी एक का इन्तज़ार है,
किसी और का ख्याल ना दिल को ग़वारा होगा
ऐ ज़िन्दगी! अब के ना शामिल करना मेरा नाम
ग़र ये खेल ही दोबारा होगा
जानता हूँ अकेला हूँ फिलहाल
पर उम्मीद है कि दूसरी ओर ज़िन्दगी का कोई और ही किनारा होगा
शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा
कौन रो रहा है रात के सन्नाटे मे
शायद मेरे जैसा तन्हाई का कोई मारा होगा
अब तो बस उसी किसी एक का इन्तज़ार है,
किसी और का ख्याल ना दिल को ग़वारा होगा
ऐ ज़िन्दगी! अब के ना शामिल करना मेरा नाम
ग़र ये खेल ही दोबारा होगा
जानता हूँ अकेला हूँ फिलहाल
पर उम्मीद है कि दूसरी ओर ज़िन्दगी का कोई और ही किनारा होगा
और तुममे मैं समाता गया..
आज फ़िर शाम डूब रही है
तेरे इन्तज़ार की,
मैने काफ़ी कोशिश की तुम्हे भूल जाने की,
और एक मन्ज़िल के करार से,
रास्ते तो मिल गये
लेकिन हर मोड पर एक नये समझौते के साथ
ज़मीर आडे आता गया
और मन्ज़िल के करीब आकर
सारा आस्मा जैसे छूट गया,
और तुममे मैं समाता गया..
फ़िज़ा में हर तरफ़ धुंध ही धुंध है,
फ़िज़ा में हर तरफ़ धुंध ही धुंध है,
कल्पना का हर झरोखा मेरे अन्दर बंद है,
बरसती ओस में भीगी यह फ़िज़ा थर्राये,
सोच मेरी लफ़्ज़ो में क्युँ ना बदल पाये,
यह नदीयां यह झरने सभी हो गये गुमसुम,
मेरी तन्हाईयों में जैसे ये सभी हो गये है गुम,
वादीयों में गुँजता हर एक गीत मधम है,
अब तो खुश रहने कि वजह भी कम है,
वक्त तो कहता है कि ये बसन्त का मौसम है,
फिर मेरे अन्दर क्युँ सर्द वीरानीयाँ कायम है,
कल्पना का हर झरोखा मेरे अन्दर बंद है,
बरसती ओस में भीगी यह फ़िज़ा थर्राये,
सोच मेरी लफ़्ज़ो में क्युँ ना बदल पाये,
यह नदीयां यह झरने सभी हो गये गुमसुम,
मेरी तन्हाईयों में जैसे ये सभी हो गये है गुम,
वादीयों में गुँजता हर एक गीत मधम है,
अब तो खुश रहने कि वजह भी कम है,
वक्त तो कहता है कि ये बसन्त का मौसम है,
फिर मेरे अन्दर क्युँ सर्द वीरानीयाँ कायम है,
आँख से दूर न हो, दिल से उतर जाएगा
आँख से दूर न हो, दिल से उतर जाएगा
वक्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा
इतना मानूस न हो खिलवत-ऐ-ग़म से अपनी
तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा
तुम सर-ऐ-राह-ऐ-वफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बाम-ऐ-रिफ़ाक़त से उतर जाएगा,
ज़िन्दगी तेरी अता है तो यह जाने वाला
तेरी बख्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जाएगा
वक्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा
इतना मानूस न हो खिलवत-ऐ-ग़म से अपनी
तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा
तुम सर-ऐ-राह-ऐ-वफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बाम-ऐ-रिफ़ाक़त से उतर जाएगा,
ज़िन्दगी तेरी अता है तो यह जाने वाला
तेरी बख्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जाएगा
मै पागल हूं
मै पागल हूं
हज़ारों ख्वाहिशें दिल में मचलती रहती हैं
बेचैन रुह भटकती रही
चैन की इक सांस को दिल की धड़कन मचलती रहती हैं
बारिश भी तो थमती नहीं
दिल की धड़कन गरजने को मचलती रहती हैं
जनाज़ा कब्र का करता रहा इन्तज़ार
ज़िन्दा लाश दिल की धड़कन रुकने को मचलती रहती हैं
हज़ारों ख्वाहिशें दिल में मचलती रहती हैं
बेचैन रुह भटकती रही
चैन की इक सांस को दिल की धड़कन मचलती रहती हैं
बारिश भी तो थमती नहीं
दिल की धड़कन गरजने को मचलती रहती हैं
जनाज़ा कब्र का करता रहा इन्तज़ार
ज़िन्दा लाश दिल की धड़कन रुकने को मचलती रहती हैं
Tuesday, November 03, 2009
काफी हैं
एक खवाब
बेनूर आँख के लिए
एक आह
खामोश लब के लिए
एक पैबंद
चाक जिगर
सीने के लिए
काफी हैं
इतने सामान
मेरे
जीने
के लिए
बेनूर आँख के लिए
एक आह
खामोश लब के लिए
एक पैबंद
चाक जिगर
सीने के लिए
काफी हैं
इतने सामान
मेरे
जीने
के लिए
Setu==PUL
पुल
लोग लोगों के दरमियाँ
पुल की जगह
दीवारें बनाते हैं
और दुनिया के मेले में
खुद को तनहा पाते हैं
इंसान इंसान के बीच
एक अजनबीपन सा क्यों हैं
क्यों समेटे रखते हैं हम खुद को
अपने ही बनाये किले में
बना लेते हैं अपने इर्द गिर्द
कछुए सा एक सुरक्षा कवच
असुरखा और अविश्वास से भरे
सहमे सहमे डरे डरे
ज़रा सी अजनबी आहट होते ही
सिमट जाते हैं उस कवच में
एक बार,हाँ,सिर्फ एक बार
कर जाओ पार,अविश्वास की दीवार
गेरों से सुख दुःख सांझे कर
गिरा दो दूरियों की दीवार
तुम वो ईंट बन कर देखो
जो दीवार में नहीं
पुल में लगाई जायेगी
जीने की रीत,तुम्हे
खुद बखुद आ जायेगी
लोग लोगों के दरमियाँ
पुल की जगह
दीवारें बनाते हैं
और दुनिया के मेले में
खुद को तनहा पाते हैं
इंसान इंसान के बीच
एक अजनबीपन सा क्यों हैं
क्यों समेटे रखते हैं हम खुद को
अपने ही बनाये किले में
बना लेते हैं अपने इर्द गिर्द
कछुए सा एक सुरक्षा कवच
असुरखा और अविश्वास से भरे
सहमे सहमे डरे डरे
ज़रा सी अजनबी आहट होते ही
सिमट जाते हैं उस कवच में
एक बार,हाँ,सिर्फ एक बार
कर जाओ पार,अविश्वास की दीवार
गेरों से सुख दुःख सांझे कर
गिरा दो दूरियों की दीवार
तुम वो ईंट बन कर देखो
जो दीवार में नहीं
पुल में लगाई जायेगी
जीने की रीत,तुम्हे
खुद बखुद आ जायेगी
TUMHI BATAO NA
तुम्ही बताओ ना
मेरी नींद को पंख लगे जब
क्या तुम्हारी भी संग
उढा ले गयी
या फिर अधजगी रात में
तारे गिनने की रस्म
मैं इकतरफा निभा गयी
मेरी नींद को पंख लगे जब
क्या तुम्हारी भी संग
उढा ले गयी
या फिर अधजगी रात में
तारे गिनने की रस्म
मैं इकतरफा निभा गयी
TUMHI BATAO NA तुम्ही
तुम्ही बताओ ना
मेरी नींद को पंख लगे जब
क्या तुम्हारी भी संग
उढा ले गयी
या फिर अधजगी रात में
तारे गिनने की रस्म
मैं इकतरफा निभा गयी
मेरी नींद को पंख लगे जब
क्या तुम्हारी भी संग
उढा ले गयी
या फिर अधजगी रात में
तारे गिनने की रस्म
मैं इकतरफा निभा गयी
ज़िन्दगी
ज़िन्दगी एक ग़ज़ल थी
ज़िन्दगी एक ग़ज़ल थी
अब अफसाना बन गयी
नियामत थी साथ तेरे
बाद तेरे सांस लेने का
बहाना बन गयी
ज़िन्दगी एक ग़ज़ल थी
अब अफसाना बन गयी
नियामत थी साथ तेरे
बाद तेरे सांस लेने का
बहाना बन गयी
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