पुल
लोग लोगों के दरमियाँ
पुल की जगह
दीवारें बनाते हैं
और दुनिया के मेले में
खुद को तनहा पाते हैं
इंसान इंसान के बीच
एक अजनबीपन सा क्यों हैं
क्यों समेटे रखते हैं हम खुद को
अपने ही बनाये किले में
बना लेते हैं अपने इर्द गिर्द
कछुए सा एक सुरक्षा कवच
असुरखा और अविश्वास से भरे
सहमे सहमे डरे डरे
ज़रा सी अजनबी आहट होते ही
सिमट जाते हैं उस कवच में
एक बार,हाँ,सिर्फ एक बार
कर जाओ पार,अविश्वास की दीवार
गेरों से सुख दुःख सांझे कर
गिरा दो दूरियों की दीवार
तुम वो ईंट बन कर देखो
जो दीवार में नहीं
पुल में लगाई जायेगी
जीने की रीत,तुम्हे
खुद बखुद आ जायेगी
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