धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो,
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो..............,
वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में,
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................,
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं,
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............,
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है,
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Tuesday, November 03, 2009
ज़िन्दगी
ज़िन्दगी एक ग़ज़ल थी ज़िन्दगी एक ग़ज़ल थी अब अफसाना बन गयी नियामत थी साथ तेरे बाद तेरे सांस लेने का बहाना बन गयी
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