Tuesday, September 15, 2009

हे रोम रोम में बसने वाले राम

हे रोम रोम में बसने वाले राम ।
जगत के स्वामी हे अंतर्यामी ।
मैं तुझसे क्या माँगू ॥

भेद तेरा कोई क्या पहचाने ।
जो तुझसा हो वो तुझे जाने ।
तेरे किये को हम क्या देवे ।
भले बुरे का नाम ॥

राम से बड़ा राम का नाम

राम से बड़ा राम का नाम ।
अंत में निकला ये परिणाम ये परिणाम ।

सिमरिये नाम रूप बिन देखे कौड़ी लगे न दाम ।
नाम के बाँधे खिंचे आयेंगे आखिर एक दिन राम ॥

जिस सागर को बिना सेतु के लाँघ सके ना राम ।
कूद गये हनुमान उसीको ले कर राम का नाम ॥

वो दिलवाले क्या पायेंगे जिन में नहीं है नाम ।
वो पत्थर भी तैरेंगे जिन पर लिखा हुआ श्री राम ॥

राम सुमिर राम सुमिर यही तेरो काज है

राम सुमिर राम सुमिर यही तेरो काज है ॥

मायाको संग त्याग हरिजू की शरण राग ।
जगत सुख मान मिथ्या झूठो सब साज है ॥ १॥

सपने जो धन पछान काहे पर करत मान ।
बारू की भीत तैसे बसुधा को राज है ॥ २॥

नानक जन कहत बात बिनसि जैहै तेरो दास ।
छिन छिन करि गयो काल तैसे जात आज है ॥ ३॥

मेरे मन में हैं राम मेरे तन में है राम

मेरे मन में हैं राम मेरे तन में है राम
मेरे मन में हैं राम मेरे तन में है राम ।
मेरे नैनों की नगरिया में राम ही राम ॥

मेरे रोम रोम के हैं राम ही रमैया ।
सांसो के स्वामी मेरी नैया के खिवैया ।
गुन गुन में है राम झुन झुन में है राम ।
मेरे मन की अटरिया में राम ही राम ॥

जनम जनम का जिनसे है नाता
मन जिनके पल छिन गुण गाता ।
सुमिरन में है राम दर्शन में है राम
मेरे मन की मुरलिया में राम ही राम ॥

जहाँ भी देखूँ तहाँ राम जी की माया
सबही के साथ श्री राम जी की छाया ।
त्रिभुवन में हैं राम हर कण में है
राम सारे जग की डगरिया में राम ही राम ॥

बोले बोले रे राम चिरैया रे

बोले बोले रे राम चिरैया रे ।
बोले रे राम चिरैया ॥

मेरे साँसों के पिंजरे में
घड़ी घड़ी बोले
घड़ी घड़ी बोले ॥
बोले बोले रे राम चिरैया रे ।
बोले रे राम चिरैया ॥

ना कोई खिड़की ना कोई डोरी
ना कोई चोर करे जो चोरी
ऐसा मेरा है राम रमैया रे ॥
बोले बोले रे राम चिरैया रे ।
बोले रे राम चिरैया ॥

उसी की नैया वही खिवैया
बह रही उस की लहरैया
चाहे लाख चले पुरवैया रे ॥
बोले बोले रे राम चिरैया रे ।
बोले रे राम चिरैया ॥

दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे ॥

मंदिर मंदिर मूरत तेरी फिर भी न दीखे सूरत तेरी ।
युग बीते ना आई मिलन की पूरनमासी रे ॥
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरि अँखियाँ प्यासी रे ॥

द्वार दया का जब तू खोले पंचम सुर में गूंगा बोले ।
अंधा देखे लंगड़ा चल कर पँहुचे काशी रे ॥
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरि अँखियाँ प्यासी रे ॥

पानी पी कर प्यास बुझाऊँ नैनन को कैसे समजाऊँ ।
आँख मिचौली छोड़ो अब तो घट घट वासी रे ॥
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरि अँखियाँ प्यासी रे ॥

ठुमक चलत रामचंद्र

ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैंजनियां ॥

किलकि किलकि उठत धाय गिरत भूमि लटपटाय ।
धाय मात गोद लेत दशरथ की रनियां ॥

अंचल रज अंग झारि विविध भांति सो दुलारि ।
तन मन धन वारि वारि कहत मृदु बचनियां ॥

विद्रुम से अरुण अधर बोलत मुख मधुर मधुर ।
सुभग नासिका में चारु लटकत लटकनियां ॥

तुलसीदास अति आनंद देख के मुखारविंद ।
रघुवर छबि के समान रघुवर छबि बनियां ॥

मेरे राम

जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को
मिल जाये तरुवर कि छाया
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है
मैं जबसे शरण तेरी आया, मेरे राम

भटका हुआ मेरा मन था कोई
मिल ना रहा था सहारा
लहरों से लड़ती हुई नाव को
जैसे मिल ना रहा हो किनारा, मिल ना रहा हो किनारा
उस लड़खड़ाती हुई नाव को जो
किसी ने किनारा दिखाया
ऐसा ही सुख ...

शीतल बने आग चंदन के जैसी
राघव कृपा हो जो तेरी
उजियाली पूनम की हो जाएं रातें
जो थीं अमावस अंधेरी, जो थीं अमावस अंधेरी
युग- युग से प्यासी मरुभूमि ने
जैसे सावन का संदेस पाया
ऐसा ही सुख ...

जिस राह की मंज़िल तेरा मिलन हो
उस पर कदम मैं बढ़ाऊं
फूलों में खारों में, पतझड़ बहारों में
मैं न कभी डगमगाऊं, मैं न कभी डगमगाऊं
पानी के प्यासे को तक़दीर ने
जैसे जी भर के अमृत पिलाया
ऐसा ही सुख ...

उठ जाग मुसाफिर

उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो तू सोवत है
जो जागत है सो पावत है, जो सोवत है वो खोवत है

खोल नींद से अँखियाँ जरा और अपने प्रभु से ध्यान लगा
यह प्रीति करन की रीती नहीं प्रभु जागत है तू सोवत है.... उठ ...

जो कल करना है आज करले जो आज करना है अब करले
जब चिडियों ने खेत चुग लिया फिर पछताये क्या होवत है... उठ ...

नादान भुगत करनी अपनी ऐ पापी पाप में चैन कहाँ
जब पाप की गठरी शीश धरी फिर शीश पकड़ क्यों रोवत है... उठ ....

अच्छी है यही खुद्दारी क्या

अच्छी है यही खुद्दारी क्या
रख जेब में दुनियादारी क्या

जो दर्द छुपा के हंस दे हम
अश्कों से हुई गद्दारी क्या

हंस के जो मिलो सोचे दुनिया
मतलब है, छुपाया भारी क्या

वे देह के भूखे, क्या जाने
ये प्यार वफ़ा दिलदारी क्या

आए काँटे, कभी गुलाब आए

आए काँटे, कभी गुलाब आए
जो भी आए वो बेहिसाब आए

रंग उड़ जाए उनके चेहरे का
जब भी मेरी वफ़ा के बाब आए

अब्र दाना.ई का हो फिर ओझल
ज़िंदगी में अगर अज़ाब आए

दोस्त बन कर मिले या दुश्मन हो
सामने जब हो, बेनक़ाब आए

घर की छत में दरार जब हो पड़ी
ऐसे आलम में कैसे ख्वाब आए

इक लड़की पागल दीवानी, गुमसुम चुप-चुप सी रहती थी

इक लड़की पागल दीवानी, गुमसुम चुप-चुप सी रहती थी
बारिश सा शोर न था उसमें, सागर की तरह वो बहती थी
कोई उस को पढ़ न पाया, न कोई उसको समझा तब
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी

शख्स जो अक्सर दिखता था, उस दिल के झरोखे में
दर्द कई वो देता था, रखता था उसको धोखे में
जितने पल रुकता था आकर, वो उस में सिमटी रहती थी
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी

इक दिन ऐसा भी आया, वो आया पर दर नहीं खुला
दरवाज़े पर हँसता था जो, इक चेहरा उस को नहीं मिला
आँसू के हर्फ वहाँ थे, और था वफ़ा का किस्सा भी
तब जान गये आख़िर, सब कैसे वो टूटी, कहाँ मिटी

समझा तब लोगों ने उसको, कैसे वो ताने सहती थी
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी


बाद उसके खत भी मिले, जिनमें कई प्यार की बातें थी
सौगातें थी पाक दुआ की, भेजी चाँदनी रातें थी
लिखा था उसने, सम्हल के रहना,इतना भी मत गुस्सा करना
अब और कोई न सीखेगा, तुम से जीना, तुम पर मारना
अब वो पागल लड़की नहीं रही, जो तुम को खूब समझती थी
हर गुस्से को हर चुप को, आसानी से जो पढ़ती थी

समझा वो भी अब जाकर, क्या उसकी आँखें कहती थी
था प्यार बला का उससे ही, वो जिसके ताने सहती थी
इक लड़की पागल दीवानी, गुमसुम चुप-चुप सी रहती थी

इक लड़की पागल दीवानी, गुमसुम चुप-चुप सी रहती थी

इक लड़की पागल दीवानी, गुमसुम चुप-चुप सी रहती थी
बारिश सा शोर न था उसमें, सागर की तरह वो बहती थी
कोई उस को पढ़ न पाया, न कोई उसको समझा तब
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी

शख्स जो अक्सर दिखता था, उस दिल के झरोखे में
दर्द कई वो देता था, रखता था उसको धोखे में
जितने पल रुकता था आकर, वो उस में सिमटी रहती थी
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी

इक दिन ऐसा भी आया, वो आया पर दर नहीं खुला
दरवाज़े पर हँसता था जो, इक चेहरा उस को नहीं मिला
आँसू के हर्फ वहाँ थे, और था वफ़ा का किस्सा भी
तब जान गये आख़िर, सब कैसे वो टूटी, कहाँ मिटी

समझा तब लोगों ने उसको, कैसे वो ताने सहती थी
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी


बाद उसके खत भी मिले, जिनमें कई प्यार की बातें थी
सौगातें थी पाक दुआ की, भेजी चाँदनी रातें थी
लिखा था उसने, सम्हल के रहना,इतना भी मत गुस्सा करना
अब और कोई न सीखेगा, तुम से जीना, तुम पर मारना
अब वो पागल लड़की नहीं रही, जो तुम को खूब समझती थी
हर गुस्से को हर चुप को, आसानी से जो पढ़ती थी

समझा वो भी अब जाकर, क्या उसकी आँखें कहती थी
था प्यार बला का उससे ही, वो जिसके ताने सहती थी
इक लड़की पागल दीवानी, गुमसुम चुप-चुप सी रहती थी

ऐसा नहीं कि हमको, मोहब्बत नहीं मिली

ऐसा नहीं कि हमको, मोहब्बत नहीं मिली
थी जिसकी आरज़ू वही, दौलत नहीं मिली

देखे अगर करे मेरे से, रश्क यार भी
सब कुछ मिला मगर वही, क़िस्मत नहीं मिली

घर को सजाते कैसे, ये लड़की हैं सीखती
ज़िंदा रहे तो कैसे, नसीहत नहीं मिली

क़िस्सा सुनाएँ किसको यहाँ, तेरे ज़ॉफ का
कहते हैं हम सभी से, कि आदत नहीं मिली

देखा गिरा के खुद को ही, क़दमों में उसके भी
“श्रद्धा” नसीब में तुझे क़ुरबत नहीं मिली

कितना है दम चराग़ में, तब ही पता चले

कितना है दम चराग़ में, तब ही पता चले
फानूस की न आस हो , उस पर हवा चले

लेता हैं इम्तिहान अगर, सब्र दे मुझे
कब तक किसी के साथ, कोई रहनुमा चले

नफ़रत की आँधियाँ कभी, बदले की आग है
अब कौन लेके झंडा –ए- अमनो-वफ़ा चले

चलना अगर गुनाह है, अपने उसूल पर
सारी उमर सज़ाओं का ही सिल सिला चले

खंजर लिये खड़ें हों अगर मीत हाथ में
“श्रद्धा” बताओ तुम वहाँ फ़िर क्या दुआ चले

क्या ख़ला हो जाएगा

मुश्किलें आई अगर तो, फ़ैसला हो जाएगा
कौन है पानी में कितने, सब पता हो जाएगा

दूरियाँ दिल की कभी जो, बढ़ भी जाएँ तो हुज़ूर
तुम बढ़ाना इक कदम, तय फासला हो जाएगा

लाए थे दुनियाँ में क्या तुम, लेके तुम क्या जाओगे
ये महल, ये रिश्ते-नाते, सब जुदा हो जाएगा

गर दुआ माँगोगे दिल से, और उस पे हो यक़ी
जब बुरा होना भी होगा, तो भला हो जाएगा

आरज़ू थी फूल इक, दामन में मेरे जाए खिल
सोचती हूँ न हुआ तो, क्या ख़ला हो जाएगा

ज़िंदगी का रास्ता होगा, बड़ा काँटों भरा
साथ तुम होगे तो “श्रद्धा” हौसला हो जाएगा

चलो कुछ बात करते हैं

चलो कुछ बात करते हैं
ज़ुबाँ, जज़्बात करते हैं

कही न दिन गुज़र जाए
मोहब्बत फिर न मर जाए
जो है एहसास ज़िंदा ,
तो अभी मुलाकात करते हैं
चलो कुछ बात करते हैं

रहे न मिलन अधूरा अब
मुझे तुम पूरा कर दो अब
मिला के लब से लब को ,
शबनमी ये रात करते हैं
चलो कुछ बात करते हैं

खलवतों में साँप जैसे
काटे हैं दिन पाप जैसे
अभी सूने से आँगन में,
सुरमई बरसात करते हैं
चलो कुछ बात करते हैं

तेरे हाथों से छूटी जो

तेरे हाथों से छूटी जो, मैं मिट्टी से हम वार हुई
हंसती-खिलती सी गुड़िया थी, इक धक्के से बेकार हुई

ज़ख्मों पर मरहम देने को, उसने तो हाथ बढाया था
मेरे जीवन की पीड़ा ही, इक दोधारी तलवार हुई

ये गर्म फ़ज़ा झुलसाएगी, पैरों में भी छाले लाएगी
देती थी जो साया मुझको, अब दूर वही दीवार हुई

दिन-रात दुआओं में मुझको, माँगा था खुदा से जिसने कभी
ये कुर्बत फिर मालूम नहीं, क्यूँ उसके दिल का भार हुई

जाने कब से खामोश थे लब, और सन्नाटा था जेहन में
इन दोनों की तन्हाई भी, महसूस मुझे इस बार हुई

जिसके कारण महका-महका मेरे जीवन का हर लम्हा
करती शुकराना हूँ उसका जिससे " श्रद्धा " इक प्यार हुई

नज़र नहीं आती

घटा से घिर गयी बदली, नज़र नहीं आती
बहा ले नीर तू उजली, नज़र नहीं आती

हवा में शोर ये कैसा सुनाई देता है
कहीं पे गिर गयी बिजली नज़र नहीं आती

है चारों ओर नुमाइश के दौर जो यारों
दुआ भी अब यहाँ असली नज़र नहीं आती

चमन में खार ने पहने, गुलों के चेहरे हैं
कली कोई कहाँ, कुचली नज़र नही आती

पहाड़ों से गिरा झरना तो यूँ ज़मीं बोली
ये दिल की पीर थी पिघली नज़र नही आती

मुझ सा ही दीवाना लगता है आईना

मुझ सा ही दीवाना लगता है आईना
पल में रोता, पल में हंसता है आईना

शायद कोई उम्मीद जगे अब सीने में
दरवाज़े को शब भर तकता है आईना

दिलवर हैं आ बैठे, पल भर को पास मेरे
इक दुल्हन जैसा अब सजता है आईना

गैरों के घर रोशन करने की है आदत
चुपचाप इसी धुन में जलता है आईना

राजा और प्यादा में अंतर करता है जग
हर इक को इक कद में रखता है आईना

आगाज़ ग़ज़ल का कर ही दो अब “श्रद्धा” तुम
उलझा-उलझा मुझको दिखता है आईना

मेरे दामन में काँटे हैं, मेरी आँखों में पानी हैं

मेरे दामन में काँटे हैं, मेरी आँखों में पानी हैं
मोहब्बत नाम जिसका है, ये उसने दी निशानी हैं

क़ज़ा ही लगती है आसां, अगर जीना जुदाई में
मिटाना है मुझे खुद को, उसे यादें मिटानी हैं

वफ़ा के वादे हैं टूटे, ज़रा सी बात पर रूठे
सज़ा बन जाती है कुरबत, अजब दिल की कहानी हैं

मिटा कर नक्श कदमों के, बने अंजान हम फिर से
मिले शायद कभी हंस कर, कि लंबी ज़िंदगानी हैं

कहाँ क़ुरबान होता है, कोई भी संग में “श्रद्धा”
ये बातें हीर रांझे की, हुई कब से पुरानी हैं

मैँने पहने हैँ कपड़े, धुले आज फिर

आप भी अब मिरे गम बढ़ा दीजिए
मुझको लंबी उमर की दुआ दीजिए

मैँने पहने हैँ कपड़े, धुले आज फिर
तोहमतें अब नई कुछ लगा दीजिए

रोशनी के लिए, इन अँधेरों में अब
कुछ नही तो मिरा दिल जला दीजिए

चाप कदमों की अपनी मैं पहचान लूँ
आईने से यूँ मुझको मिला दीजिए

गर मुहब्बत ज़माने में है इक ख़ता
आप मुझको भी कोई सज़ा दीजिए

चाँद मेरे दुखों को न समझे कभी
चाँदनी आज उसकी बुझा दीजिए

हंसते हंसते जो इक पल में गुमसुम हुई
राज़ "श्रद्धा" नमीं का बता दीजिए

मैँने पहने हैँ कपड़े, धुले आज फिर

आप भी अब मिरे गम बढ़ा दीजिए
मुझको लंबी उमर की दुआ दीजिए

मैँने पहने हैँ कपड़े, धुले आज फिर
तोहमतें अब नई कुछ लगा दीजिए

रोशनी के लिए, इन अँधेरों में अब
कुछ नही तो मिरा दिल जला दीजिए

चाप कदमों की अपनी मैं पहचान लूँ
आईने से यूँ मुझको मिला दीजिए

गर मुहब्बत ज़माने में है इक ख़ता
आप मुझको भी कोई सज़ा दीजिए

चाँद मेरे दुखों को न समझे कभी
चाँदनी आज उसकी बुझा दीजिए

हंसते हंसते जो इक पल में गुमसुम हुई
राज़ "श्रद्धा" नमीं का बता दीजिए

रब हो साजिश में शामिल तो क्या कीजिए

रब हो साजिश में शामिल तो क्या कीजिए ,
मौत बन जाए साहिल तो क्या कीजिए

उसके शानो पर रोना हुआ है फज़ूल ,
मेरा साजन है गाफिल तो क्या कीजिए

दर्द कहने का अंदाज़ है बस जुदा ,
गर जो थम जाए महफ़िल तो क्या कीजिए

तुम ने पाई बुलंदी नई भी तो क्या ,
हो खुशी ही न हासिल तो क्या कीजिए

फूल ही फूल थे इस फ़िज़ा में खिले
मैं ही काँटों के काबिल तो क्या कीजिए

सूखा फिर भी नहीं है, दरख़्त -ए- वफ़ा
गर हो मौसम ही बोझिल तो क्या कीजिए

लूटा कर जान दिलदारी नहीं क़ी

लूटा कर जान दिलदारी नहीं क़ी
ख़ता हम ने बड़ी भारी नहीं की

खुशी से प्यार है मुझ को भी लेकिन
कभी अश्कों से गद्दारी नहीं क़ी

बता के खुद को मुफ़लिस इस जहाँ में
कहीं रुसवा तो खुद्दारी नहीं की

चरागों को बुझाया गम छिपाने
ये सूरज की तरफ़दारी नहीं की

न हासिल थी तरक्की जब शगल में
कभी दिल पर खिज़ां तारी नहीं की

न कहिए मेरी चाहत को हवस यूँ
कोई हसरत भी बाज़ारी नहीं की

वक़्त करता कुछ दगा या, तुम दगा करते कभी

वक़्त करता कुछ दगा या, तुम दगा करते कभी
था जुदा होना ही हमको, हाथ को मलते कभी

आजकल रिश्तों में क्या है, लेने-देने के सिवा
खाली हाथों को यहाँ, दो हाथ न मिलते कभी

थक गये थे तुम जहाँ, वो आख़िरी था इम्तिहाँ
दो कदम मंज़िल थी तेरी, काश तुम चलते कभी

कुरबतें ज़ंज़ीर सी, लगती उसे अब प्यार में
चाहतें रहती जवाँ, गर हिज्र में जलते कभी

कल सिसक के हिन्दी बोली, ए मेरे बेटे कहो
क्यूँ शरम आती है तुमको, जो मुझे लिखते कभी

आजकल मिट्टी वतन की, रोज कहती है मुझे
लौट आओ ए परिंदे, शाम के ढलते कभी

वो धूप उजली सी, सुहानी शाम भी नहीं

वो धूप उजली सी, सुहानी शाम भी नहीं
परदेश में घर जैसा तो, आराम भी नहीं

सपने हुए है पूरे, गर साथी मिरे कहो
क्यूँ नज़रों में दिखता, खुशी का नाम भी नहीं

तू अपने हक़ में बोलने की सोच तो ज़रा
गूंगा नहीं तू, बहरी ये आवाम भी नहीं

जब इश्क़ दौलत के तराज़ू पे बिक गया
आती वफ़ा डर के ही लब-ए-बाम भी नहीं

हर एक को कहती हो अपना दोस्त तुम जहाँ
इक दोस्त ही मिलना, वहाँ पे आम भी नहीं

वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको

छोटी सी भी मज़बूरी, कर देगी जुदा हमको
वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको

रिश्तों की कसौटी पर, खुद को ही मिटा आए
हम चलते रहे तन्हा, थे साथ नहीं साए
अश्कों के सिवा उनसे, कुछ भी न मिला हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको

मौला ये बता दे मुझे, मेरा दिल क्यूँ सुलगता है
सूरज में जलन है गर, क्यूँ चाँद पिघलता है
साँसों के भी चलने से, लगता है बुरा हमको
वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको

सोचा कि मना लूँ उन्हें, मिन्नत भी कई कर लूँ
कदमों में गिर जाऊं, बाहों में उन्हें भर लूँ
होगा ये नही लेकिन, आसां जो लगा हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको

गिरते हुए कदमों की, आहट पर न जाना तुम
मर जाएँगे हम यूँ ही, न अश्क़ बहाना तुम
आँसू ये तेरे अब भी, लगते हैं सज़ा हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको

है याद .........

है याद तुम्हारा कानों में, हौले से कुछ कह जाना
वादों से कैसे सीखे, इस भोले दिल को बहलाना

बहुत दिनों के बाद, सपने में तुम्हें फिर पाया है
तकिये को हमने आज फिर, सीने से अपने लगाया है
बहुत प्यारी सी बातें है, बहुत मीठी सी यादें है
तुम इस भोली नाज़ुक लड़की को, सपने से नहीं जगाना

है याद तुम्हारा कानों में, हौले से कुछ कह जाना
वादों से कैसे सीखे, इस भोले दिल को बहलाना

जागी-जागी रतियाँ गुज़री, तारों से बातें करते
थोड़ा सा उम्मीद में जीते, थोड़ा थोड़ा हम मरते
न आते हो मिलने तुम, न कोई खबरिया आती है
ख्वाबों में मिलकर तुमसे, है सीख लिया तुमको पाना

है याद तुम्हारा हौले से, कानों में कुछ कह जाना

Sunday, September 06, 2009

Jo Hum Pe gujerti hai..........

Jo Hum Pe gujerti hai Tanha kise Samjhayen

Tum bhi to Nahin Apne Jayen to Kidher Jayen!

Samjha Hai Na Samjhega is Gum ko Yahan Koi,

Bederdon ki Basti Hai, Hamdard Yahan Koi,

Jo Dil Hi Tumara hai Wo Hum Kise Dikhlain.

Jab Jane Bafa Teri Furket Na Satayegi

Wo Subah Kub Aayegi Wo Shaam Kab Aayegi

Kab Tek Dile Nadan Ko Hum Kaise Behlayen!

Aaja Ke Ulfet ki Mitne Ko Hain Tesveran,

Pehren hain Nigahon pe aur Paon(Feet) main Janjeeran,

Bus Main Nahin verna, Hum Urke Chale Aate.