हे रोम रोम में बसने वाले राम ।
जगत के स्वामी हे अंतर्यामी ।
मैं तुझसे क्या माँगू ॥
जो तुझसा हो वो तुझे जाने ।
तेरे किये को हम क्या देवे ।
भले बुरे का नाम ॥
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो, ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो.............., वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में, क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................, पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं, अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............, फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है, वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
हे रोम रोम में बसने वाले राम ।
जगत के स्वामी हे अंतर्यामी ।
मैं तुझसे क्या माँगू ॥
राम से बड़ा राम का नाम ।
अंत में निकला ये परिणाम ये परिणाम ।
सिमरिये नाम रूप बिन देखे कौड़ी लगे न दाम ।
नाम के बाँधे खिंचे आयेंगे आखिर एक दिन राम ॥
जिस सागर को बिना सेतु के लाँघ सके ना राम ।
कूद गये हनुमान उसीको ले कर राम का नाम ॥
वो दिलवाले क्या पायेंगे जिन में नहीं है नाम ।
वो पत्थर भी तैरेंगे जिन पर लिखा हुआ श्री राम ॥
राम सुमिर राम सुमिर यही तेरो काज है ॥
मायाको संग त्याग हरिजू की शरण राग ।
जगत सुख मान मिथ्या झूठो सब साज है ॥ १॥
सपने जो धन पछान काहे पर करत मान ।
बारू की भीत तैसे बसुधा को राज है ॥ २॥
मेरे मन में हैं राम मेरे तन में है राम
मेरे मन में हैं राम मेरे तन में है राम ।
मेरे नैनों की नगरिया में राम ही राम ॥
मेरे रोम रोम के हैं राम ही रमैया ।
सांसो के स्वामी मेरी नैया के खिवैया ।
गुन गुन में है राम झुन झुन में है राम ।
मेरे मन की अटरिया में राम ही राम ॥
जनम जनम का जिनसे है नाता
मन जिनके पल छिन गुण गाता ।
सुमिरन में है राम दर्शन में है राम
मेरे मन की मुरलिया में राम ही राम ॥
जहाँ भी देखूँ तहाँ राम जी की माया
सबही के साथ श्री राम जी की छाया ।
त्रिभुवन में हैं राम हर कण में है
राम सारे जग की डगरिया में राम ही राम ॥
बोले बोले रे राम चिरैया रे ।
बोले रे राम चिरैया ॥
मेरे साँसों के पिंजरे में
घड़ी घड़ी बोले
घड़ी घड़ी बोले ॥
बोले बोले रे राम चिरैया रे ।
बोले रे राम चिरैया ॥
ना कोई खिड़की ना कोई डोरी
ना कोई चोर करे जो चोरी
ऐसा मेरा है राम रमैया रे ॥
बोले बोले रे राम चिरैया रे ।
बोले रे राम चिरैया ॥
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे ॥
मंदिर मंदिर मूरत तेरी फिर भी न दीखे सूरत तेरी ।
युग बीते ना आई मिलन की पूरनमासी रे ॥
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरि अँखियाँ प्यासी रे ॥
द्वार दया का जब तू खोले पंचम सुर में गूंगा बोले ।
अंधा देखे लंगड़ा चल कर पँहुचे काशी रे ॥
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरि अँखियाँ प्यासी रे ॥
पानी पी कर प्यास बुझाऊँ नैनन को कैसे समजाऊँ ।
आँख मिचौली छोड़ो अब तो घट घट वासी रे ॥
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरि अँखियाँ प्यासी रे ॥
उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो तू सोवत है
जो जागत है सो पावत है, जो सोवत है वो खोवत है
खोल नींद से अँखियाँ जरा और अपने प्रभु से ध्यान लगा
यह प्रीति करन की रीती नहीं प्रभु जागत है तू सोवत है.... उठ ...
जो कल करना है आज करले जो आज करना है अब करले
जब चिडियों ने खेत चुग लिया फिर पछताये क्या होवत है... उठ ...
नादान भुगत करनी अपनी ऐ पापी पाप में चैन कहाँ
जब पाप की गठरी शीश धरी फिर शीश पकड़ क्यों रोवत है... उठ ....
मुश्किलें आई अगर तो, फ़ैसला हो जाएगा
कौन है पानी में कितने, सब पता हो जाएगा
दूरियाँ दिल की कभी जो, बढ़ भी जाएँ तो हुज़ूर
तुम बढ़ाना इक कदम, तय फासला हो जाएगा
लाए थे दुनियाँ में क्या तुम, लेके तुम क्या जाओगे
ये महल, ये रिश्ते-नाते, सब जुदा हो जाएगा
गर दुआ माँगोगे दिल से, और उस पे हो यक़ी
जब बुरा होना भी होगा, तो भला हो जाएगा
आरज़ू थी फूल इक, दामन में मेरे जाए खिल
सोचती हूँ न हुआ तो, क्या ख़ला हो जाएगा
ज़िंदगी का रास्ता होगा, बड़ा काँटों भरा
साथ तुम होगे तो “श्रद्धा” हौसला हो जाएगा
घटा से घिर गयी बदली, नज़र नहीं आती
बहा ले नीर तू उजली, नज़र नहीं आती
हवा में शोर ये कैसा सुनाई देता है
कहीं पे गिर गयी बिजली नज़र नहीं आती
है चारों ओर नुमाइश के दौर जो यारों
दुआ भी अब यहाँ असली नज़र नहीं आती
चमन में खार ने पहने, गुलों के चेहरे हैं
कली कोई कहाँ, कुचली नज़र नही आती
पहाड़ों से गिरा झरना तो यूँ ज़मीं बोली
ये दिल की पीर थी पिघली नज़र नही आती
आप भी अब मिरे गम बढ़ा दीजिए
मुझको लंबी उमर की दुआ दीजिए
मैँने पहने हैँ कपड़े, धुले आज फिर
तोहमतें अब नई कुछ लगा दीजिए
रोशनी के लिए, इन अँधेरों में अब
कुछ नही तो मिरा दिल जला दीजिए
चाप कदमों की अपनी मैं पहचान लूँ
आईने से यूँ मुझको मिला दीजिए
गर मुहब्बत ज़माने में है इक ख़ता
आप मुझको भी कोई सज़ा दीजिए
चाँद मेरे दुखों को न समझे कभी
चाँदनी आज उसकी बुझा दीजिए
हंसते हंसते जो इक पल में गुमसुम हुई
राज़ "श्रद्धा" नमीं का बता दीजिए
आप भी अब मिरे गम बढ़ा दीजिए
मुझको लंबी उमर की दुआ दीजिए
मैँने पहने हैँ कपड़े, धुले आज फिर
तोहमतें अब नई कुछ लगा दीजिए
रोशनी के लिए, इन अँधेरों में अब
कुछ नही तो मिरा दिल जला दीजिए
चाप कदमों की अपनी मैं पहचान लूँ
आईने से यूँ मुझको मिला दीजिए
गर मुहब्बत ज़माने में है इक ख़ता
आप मुझको भी कोई सज़ा दीजिए
चाँद मेरे दुखों को न समझे कभी
चाँदनी आज उसकी बुझा दीजिए
हंसते हंसते जो इक पल में गुमसुम हुई
राज़ "श्रद्धा" नमीं का बता दीजिए
रब हो साजिश में शामिल तो क्या कीजिए ,
मौत बन जाए साहिल तो क्या कीजिए
उसके शानो पर रोना हुआ है फज़ूल ,
मेरा साजन है गाफिल तो क्या कीजिए
दर्द कहने का अंदाज़ है बस जुदा ,
गर जो थम जाए महफ़िल तो क्या कीजिए
तुम ने पाई बुलंदी नई भी तो क्या ,
हो खुशी ही न हासिल तो क्या कीजिए
फूल ही फूल थे इस फ़िज़ा में खिले
मैं ही काँटों के काबिल तो क्या कीजिए
सूखा फिर भी नहीं है, दरख़्त -ए- वफ़ा
गर हो मौसम ही बोझिल तो क्या कीजिए
लूटा कर जान दिलदारी नहीं क़ी
ख़ता हम ने बड़ी भारी नहीं की
खुशी से प्यार है मुझ को भी लेकिन
कभी अश्कों से गद्दारी नहीं क़ी
बता के खुद को मुफ़लिस इस जहाँ में
कहीं रुसवा तो खुद्दारी नहीं की
चरागों को बुझाया गम छिपाने
ये सूरज की तरफ़दारी नहीं की
न हासिल थी तरक्की जब शगल में
कभी दिल पर खिज़ां तारी नहीं की
न कहिए मेरी चाहत को हवस यूँ
कोई हसरत भी बाज़ारी नहीं की
वक़्त करता कुछ दगा या, तुम दगा करते कभी
था जुदा होना ही हमको, हाथ को मलते कभी
आजकल रिश्तों में क्या है, लेने-देने के सिवा
खाली हाथों को यहाँ, दो हाथ न मिलते कभी
थक गये थे तुम जहाँ, वो आख़िरी था इम्तिहाँ
दो कदम मंज़िल थी तेरी, काश तुम चलते कभी
कुरबतें ज़ंज़ीर सी, लगती उसे अब प्यार में
चाहतें रहती जवाँ, गर हिज्र में जलते कभी
कल सिसक के हिन्दी बोली, ए मेरे बेटे कहो
क्यूँ शरम आती है तुमको, जो मुझे लिखते कभी
आजकल मिट्टी वतन की, रोज कहती है मुझे
लौट आओ ए परिंदे, शाम के ढलते कभी