लूटा कर जान दिलदारी नहीं क़ी
ख़ता हम ने बड़ी भारी नहीं की
खुशी से प्यार है मुझ को भी लेकिन
कभी अश्कों से गद्दारी नहीं क़ी
बता के खुद को मुफ़लिस इस जहाँ में
कहीं रुसवा तो खुद्दारी नहीं की
चरागों को बुझाया गम छिपाने
ये सूरज की तरफ़दारी नहीं की
न हासिल थी तरक्की जब शगल में
कभी दिल पर खिज़ां तारी नहीं की
न कहिए मेरी चाहत को हवस यूँ
कोई हसरत भी बाज़ारी नहीं की
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो, ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो.............., वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में, क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................, पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं, अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............, फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है, वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Tuesday, September 15, 2009
लूटा कर जान दिलदारी नहीं क़ी
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