धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो,
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो..............,
वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में,
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................,
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं,
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............,
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है,
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Tuesday, September 15, 2009
हे रोम रोम में बसने वाले राम
हे रोम रोम में बसने वाले राम । जगत के स्वामी हे अंतर्यामी । मैं तुझसे क्या माँगू ॥
भेद तेरा कोई क्या पहचाने । जो तुझसा हो वो तुझे जाने । तेरे किये को हम क्या देवे । भले बुरे का नाम ॥
1 comment:
बहुत अच्छे और पवन विचार हैं, श्री राम जी की जय
श्री राम जी संसार से कुंठाओं को मिटायें
अपनी अपनी डगर
Post a Comment