Sunday, October 11, 2009

सेतु .. चाहता हें..........

बहुत देर बेठे सिद्धांतों के मठ में

अब बाजार जाने को जी चाहता है

जब से देखी शराफत की फजीहत

इसका व्यापार करने को जी चाहता हें

सोचा था लड़लेंगे कलम से लडाई ,

मगर कमबख्तों ने हाथ ही काट डाला

अब तो बस इक हाथ सलामत हें ,

हथियार उठाने को जी चाहता है

बहुत देर बेठे .........................

संकल्प था की कलम की स्याही से

बदल देंगे दुनिया के स्याह हालात

सबको दिलायेगे महावीर ,

बुद्ध और गाँधी की याद

मगर सब है..ये किताबों की बात .....

अब तो भगत सिंह या आज़ाद

होने को जी चाहता हें

.बहुत देर बेठे ....

लगे सात सौ साल

हमे होने में आज़ाद (?)

मगरसिर्फ ६० वर्ष मे

ही हो गये बर्बाद

बद से बदत्तर है.. हर ...हालात

सौगंध भारती मैया की

अब देशद्रोहियों का सर्वनाश

करने को जी चाहता है

बहुत देर बैठे सिन्द्धान्तो के ...

ए जीना भी कोई जीना है दोस्तों

जवान और किसान दोनों ही

जलील हो रहे है दोस्तों

जिस्म सस्ता और आटा महंगा हें दोस्तों

बहुत जी ली जलालत कि जिन्दगी अब

फख्र कि मौत मरने को जी चाहता है

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