Saturday, November 21, 2009

Kaynat.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,.,..

एक मेरा दामन अकेला, ख़ुशियाँ हज़ाराँ कहाँ रक्खूँ,,
सदियों से जो साथ मेरे था, रंज बेचारा कहाँ रक्खूँ .
(Ek meraa daaman akelaa,khushiyaan hazaaraan kahaan rakhun,,
Sadiyon se jo saath mere thaa, ranj bechaaraa kahaan rakhun.)


सुखों की बारिश ऐसी बरसी,ग़म का छप्पर भीग गया,
जिस्मों-रूह में बेहद ठन्डक , दिल का शरारा कहाँ रक्खूँ .
(Sukhon ki bearish aisi barasi,gam ka chhappar bheeg gayaa,,
Jismon rooh me behad thandak, dil kaa sharaaraa kahaan rakhun.


उजियारों से वहशत खा गए , यार मेरी तन्हाई के,,
अन्धियारों-वीरानों को तरसूँ, चांद-सितारा कहाँ रक्खूँ .
(Ujiyaaron se vahashat khaa gae, yaar meri tanhaai ke,,
Andhiyaron–viraanon ko tarasoon,chaand sitaaraa kahaan rakhun.)

गुल सूखे-गुलशन उजड़े, बुलबुल कब की दफ़्न हुई,,
अबके मौसम झूम के आई, सब्ज़े-बहाराँ कहाँ रक्खूँ .
(Gul sookhe-gulshan ujade,bulbul kab ki dafna hui,,
Abake mausam jhoom ke aai, sabze-bahaaraa kahaan rakhun.)


चाँदी का चम्मच मुँह में, और कभी मुफ़्लिसी का समाँ,,
इसपे क्या खुश होऊँ, बहती वक़्त की धारा कहाँ रक्खूँ .
(Chaandi ka chammach muh me, aur kabhi muflisi kaa samaan,,
Isape kyaa khush houn, bahatee vaqta ki dhaaraa kahaan rakhun)

Saturday, November 07, 2009

कभी सुबह से कभी सहर से लड़ा करती थी,

कभी सुबह से कभी सहर से लड़ा करती थी,
मुद्दतें हुयी एक शमा यहाँ जला करती थी,

क्या बात हुयी के आज सर-ए-शाम बंद हो गयी,
एक खिड़की जो औकात-ए-सहर खुला करती थी,

सिमटा है दिल क्यों? अब के बार इस तूफ़ान में,
गरजते थे बादल, बिजली पहले भी गिरा करती थी,

कुछ कसूर-ए-किसमत-ए-अमां का है वरना,
नाउम्मीदी इस दिल से दूर ही रहा करती थी,

खता मेरी ही थी जो दुनिया से दिल लगा बैठे,

ये कमबख्त जिन्दगी कब किसी से वफ़ा करती थी,


मैं काश ये कह सकता "मुझे याद कीजिये"
कभी मेरी याद जिनकी धड़कन हुआ करती थी,

देखो आज हम उनकी दुनिया में शामिल ही नहीं,

जिनकी दुनिया की रौनक हम से हुआ करती थी,

अपनी हाथो की लकीरों में बसना चाहता हूँ

इस बार कुछ ऐसा मैं चाहता हूँ
तुम को अपना बनाना चाहता हूँ


भुला के अपने सारे गम,
तुझे दिल से अपनाना चाहता हूँ


तुम्हे तुम्हारी इजाज़त से
अपने दिल में बसाना चाहता हूँ


अपने नाम के साथ जोड़ कर तुम्हारा नाम
दुनिया को सर-ए-आम दिखाना चाहता हूँ

कहीं कबुलियत की घड़ी ना आ जाये

तुम्हे हर दुआ में मांगना चाहता हूँ

हो जाओ तुम मेरी और मैं तुम्हारा

हर पल हब ये ही अहसास चाहता हूँ,


तुम से ही बस मोहब्बत की है मैंने,
अपनी सारी जिन्दगी तुम्हारे संग बिताना चाहता हूँ,

हक से कहता हूँ तुम्हे मैं अपना,

बस तुमसे भी ये कहलाना चाहता हूँ,


अपनी हाथो की लकीरों में बसना चाहता हूँ,,,,,,,,,,,,,,,,,,

ज़िन्दगी का कोई और ही किनारा होगा

देखो पानी मे चलता एक अन्जान साया,
शायद किसी ने दूसरे किनारे पर अपना पैर उतारा होगा
कौन रो रहा है रात के सन्नाटे मे
शायद मेरे जैसा तन्हाई का कोई मारा होगा
अब तो बस उसी किसी एक का इन्तज़ार है,
किसी और का ख्याल ना दिल को ग़वारा होगा
ऐ ज़िन्दगी! अब के ना शामिल करना मेरा नाम
ग़र ये खेल ही दोबारा होगा
जानता हूँ अकेला हूँ फिलहाल
पर उम्मीद है कि दूसरी ओर ज़िन्दगी का कोई और ही किनारा होगा

और तुममे मैं समाता गया..

आज फ़िर शाम डूब रही है
तेरे इन्तज़ार की,
मैने काफ़ी कोशिश की तुम्हे भूल जाने की,
और एक मन्ज़िल के करार से,
रास्ते तो मिल गये
लेकिन हर मोड पर एक नये समझौते के साथ
ज़मीर आडे आता गया
और मन्ज़िल के करीब आकर
सारा आस्मा जैसे छूट गया,
और तुममे मैं समाता गया..

फ़िज़ा में हर तरफ़ धुंध ही धुंध है,

फ़िज़ा में हर तरफ़ धुंध ही धुंध है,
कल्पना का हर झरोखा मेरे अन्दर बंद है,
बरसती ओस में भीगी यह फ़िज़ा थर्राये,
सोच मेरी लफ़्ज़ो में क्युँ ना बदल पाये,
यह नदीयां यह झरने सभी हो गये गुमसुम,
मेरी तन्हाईयों में जैसे ये सभी हो गये है गुम,
वादीयों में गुँजता हर एक गीत मधम है,
अब तो खुश रहने कि वजह भी कम है,
वक्त तो कहता है कि ये बसन्त का मौसम है,
फिर मेरे अन्दर क्युँ सर्द वीरानीयाँ कायम है,

आँख से दूर न हो, दिल से उतर जाएगा

आँख से दूर न हो, दिल से उतर जाएगा
वक्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा

इतना मानूस न हो खिलवत-ऐ-ग़म से अपनी
तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा

तुम सर-ऐ-राह-ऐ-वफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बाम-ऐ-रिफ़ाक़त से उतर जाएगा,

ज़िन्दगी तेरी अता है तो यह जाने वाला
तेरी बख्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जाएगा

मै पागल हूं

मै पागल हूं
हज़ारों ख्वाहिशें दिल में मचलती रहती हैं

बेचैन रुह भटकती रही
चैन की इक सांस को दिल की धड़कन मचलती रहती हैं

बारिश भी तो थमती नहीं
दिल की धड़कन गरजने को मचलती रहती हैं

जनाज़ा कब्र का करता रहा इन्तज़ार
ज़िन्दा लाश दिल की धड़कन रुकने को मचलती रहती हैं

Tuesday, November 03, 2009

काफी हैं

एक खवाब
बेनूर आँख के लिए
एक आह
खामोश लब के लिए
एक पैबंद
चाक जिगर
सीने के लिए

काफी हैं
इतने सामान
मेरे
जीने
के लिए

Setu==PUL

पुल
लोग लोगों के दरमियाँ
पुल की जगह
दीवारें बनाते हैं
और दुनिया के मेले में
खुद को तनहा पाते हैं

इंसान इंसान के बीच
एक अजनबीपन सा क्यों हैं
क्यों समेटे रखते हैं हम खुद को
अपने ही बनाये किले में
बना लेते हैं अपने इर्द गिर्द
कछुए सा एक सुरक्षा कवच
असुरखा और अविश्वास से भरे
सहमे सहमे डरे डरे
ज़रा सी अजनबी आहट होते ही
सिमट जाते हैं उस कवच में

एक बार,हाँ,सिर्फ एक बार
कर जाओ पार,अविश्वास की दीवार
गेरों से सुख दुःख सांझे कर
गिरा दो दूरियों की दीवार

तुम वो ईंट बन कर देखो
जो दीवार में नहीं
पुल में लगाई जायेगी
जीने की रीत,तुम्हे
खुद बखुद आ जायेगी

TUMHI BATAO NA

तुम्ही बताओ ना
मेरी नींद को पंख लगे जब
क्या तुम्हारी भी संग
उढा ले गयी
या फिर अधजगी रात में
तारे गिनने की रस्म
मैं इकतरफा निभा गयी

TUMHI BATAO NA तुम्ही

तुम्ही बताओ ना
मेरी नींद को पंख लगे जब
क्या तुम्हारी भी संग
उढा ले गयी
या फिर अधजगी रात में
तारे गिनने की रस्म
मैं इकतरफा निभा गयी

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी एक ग़ज़ल थी
ज़िन्दगी एक ग़ज़ल थी
अब अफसाना बन गयी
नियामत थी साथ तेरे
बाद तेरे सांस लेने का
बहाना बन गयी

Sunday, October 11, 2009

बुझा दो दिया अब तलक जल रहा है.....

जमीं चल रही है, फलक चल रहा है
बुझा दो दिया अब तलक जल रहा है?
जो पूरी न होगी कभी ज़िंदगी में
भला ऐसी उम्मीद का हम करें क्या?
मिलेगी तुझे तेरी ख्वाबों की मंज़िल
ये कह भाग्य तारा हमें छल रहा है

बुझा दो दिया अब तलक जल रहा है

जहाँ में सजी है चिरागों की महफ़िल
मगर मैं हूँ तन्हा है तन्हा मेरा दिल
जो खुद को कभी हमने खुद ही दिया था
वो झूठा दिलासा हमें खल रहा है

बुझा दो दिया अब तलक जल रहा है

ये चाहत की मंज़िल वो सपनों की राहें
किसी का सहारा किसी की निगाहें
ये झूठी जहाँ की है तस्वीर सारी
ये कहता क्षितिज पर अनल ढल रहा है

बुझा दो दिया अब तलक जल रहा है.....

Success

Success is like a beautiful girl
it will leave us at any time,
but failure is like a mother
it will teach us some
important lessons of life.

Kuch Log Badal Gaye Hain

Is Raat Ki...Tanhayeeon K
Sab Rang Badal Gaye Hain
Chand Nikla Hai Waisay He
Andharay Badal Gaye Hain


Jin K Bharosay Theen Khushian
Woh Badal Thahar Gaye Hain
Manzilain To Ab Bhi Woh He Hain
Kuch Rastay Badal Gaye Hain


Jin Pe Kiya Tha Bharosa Hum Nay
Woh Dost Bichar Gaye Hain
Dekhay Thay Jo Hum Nay
Woh Khuwab Badal Gay Hain


Jo Banay Thay Kabhi Humsafar
Aaj Woh He Mukar Gaye Hain
Iss Tutay Huay Dil K Saray
Jazbaat Badal Gaye Hain


Na Badla Kabhi Zamana
Na Badley Zamane Ke Khayal
Bas Rona Hai Yehi
Kuch Log Badal Gayee Hain

Heart

When there is a confusion between
your heart and mind,
don't listen to your mind because mind
knows everything

सेतु .. चाहता हें..........

बहुत देर बेठे सिद्धांतों के मठ में

अब बाजार जाने को जी चाहता है

जब से देखी शराफत की फजीहत

इसका व्यापार करने को जी चाहता हें

सोचा था लड़लेंगे कलम से लडाई ,

मगर कमबख्तों ने हाथ ही काट डाला

अब तो बस इक हाथ सलामत हें ,

हथियार उठाने को जी चाहता है

बहुत देर बेठे .........................

संकल्प था की कलम की स्याही से

बदल देंगे दुनिया के स्याह हालात

सबको दिलायेगे महावीर ,

बुद्ध और गाँधी की याद

मगर सब है..ये किताबों की बात .....

अब तो भगत सिंह या आज़ाद

होने को जी चाहता हें

.बहुत देर बेठे ....

लगे सात सौ साल

हमे होने में आज़ाद (?)

मगरसिर्फ ६० वर्ष मे

ही हो गये बर्बाद

बद से बदत्तर है.. हर ...हालात

सौगंध भारती मैया की

अब देशद्रोहियों का सर्वनाश

करने को जी चाहता है

बहुत देर बैठे सिन्द्धान्तो के ...

ए जीना भी कोई जीना है दोस्तों

जवान और किसान दोनों ही

जलील हो रहे है दोस्तों

जिस्म सस्ता और आटा महंगा हें दोस्तों

बहुत जी ली जलालत कि जिन्दगी अब

फख्र कि मौत मरने को जी चाहता है

Tuesday, September 15, 2009

हे रोम रोम में बसने वाले राम

हे रोम रोम में बसने वाले राम ।
जगत के स्वामी हे अंतर्यामी ।
मैं तुझसे क्या माँगू ॥

भेद तेरा कोई क्या पहचाने ।
जो तुझसा हो वो तुझे जाने ।
तेरे किये को हम क्या देवे ।
भले बुरे का नाम ॥

राम से बड़ा राम का नाम

राम से बड़ा राम का नाम ।
अंत में निकला ये परिणाम ये परिणाम ।

सिमरिये नाम रूप बिन देखे कौड़ी लगे न दाम ।
नाम के बाँधे खिंचे आयेंगे आखिर एक दिन राम ॥

जिस सागर को बिना सेतु के लाँघ सके ना राम ।
कूद गये हनुमान उसीको ले कर राम का नाम ॥

वो दिलवाले क्या पायेंगे जिन में नहीं है नाम ।
वो पत्थर भी तैरेंगे जिन पर लिखा हुआ श्री राम ॥

राम सुमिर राम सुमिर यही तेरो काज है

राम सुमिर राम सुमिर यही तेरो काज है ॥

मायाको संग त्याग हरिजू की शरण राग ।
जगत सुख मान मिथ्या झूठो सब साज है ॥ १॥

सपने जो धन पछान काहे पर करत मान ।
बारू की भीत तैसे बसुधा को राज है ॥ २॥

नानक जन कहत बात बिनसि जैहै तेरो दास ।
छिन छिन करि गयो काल तैसे जात आज है ॥ ३॥

मेरे मन में हैं राम मेरे तन में है राम

मेरे मन में हैं राम मेरे तन में है राम
मेरे मन में हैं राम मेरे तन में है राम ।
मेरे नैनों की नगरिया में राम ही राम ॥

मेरे रोम रोम के हैं राम ही रमैया ।
सांसो के स्वामी मेरी नैया के खिवैया ।
गुन गुन में है राम झुन झुन में है राम ।
मेरे मन की अटरिया में राम ही राम ॥

जनम जनम का जिनसे है नाता
मन जिनके पल छिन गुण गाता ।
सुमिरन में है राम दर्शन में है राम
मेरे मन की मुरलिया में राम ही राम ॥

जहाँ भी देखूँ तहाँ राम जी की माया
सबही के साथ श्री राम जी की छाया ।
त्रिभुवन में हैं राम हर कण में है
राम सारे जग की डगरिया में राम ही राम ॥

बोले बोले रे राम चिरैया रे

बोले बोले रे राम चिरैया रे ।
बोले रे राम चिरैया ॥

मेरे साँसों के पिंजरे में
घड़ी घड़ी बोले
घड़ी घड़ी बोले ॥
बोले बोले रे राम चिरैया रे ।
बोले रे राम चिरैया ॥

ना कोई खिड़की ना कोई डोरी
ना कोई चोर करे जो चोरी
ऐसा मेरा है राम रमैया रे ॥
बोले बोले रे राम चिरैया रे ।
बोले रे राम चिरैया ॥

उसी की नैया वही खिवैया
बह रही उस की लहरैया
चाहे लाख चले पुरवैया रे ॥
बोले बोले रे राम चिरैया रे ।
बोले रे राम चिरैया ॥

दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियाँ प्यासी रे ॥

मंदिर मंदिर मूरत तेरी फिर भी न दीखे सूरत तेरी ।
युग बीते ना आई मिलन की पूरनमासी रे ॥
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरि अँखियाँ प्यासी रे ॥

द्वार दया का जब तू खोले पंचम सुर में गूंगा बोले ।
अंधा देखे लंगड़ा चल कर पँहुचे काशी रे ॥
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरि अँखियाँ प्यासी रे ॥

पानी पी कर प्यास बुझाऊँ नैनन को कैसे समजाऊँ ।
आँख मिचौली छोड़ो अब तो घट घट वासी रे ॥
दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरि अँखियाँ प्यासी रे ॥

ठुमक चलत रामचंद्र

ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैंजनियां ॥

किलकि किलकि उठत धाय गिरत भूमि लटपटाय ।
धाय मात गोद लेत दशरथ की रनियां ॥

अंचल रज अंग झारि विविध भांति सो दुलारि ।
तन मन धन वारि वारि कहत मृदु बचनियां ॥

विद्रुम से अरुण अधर बोलत मुख मधुर मधुर ।
सुभग नासिका में चारु लटकत लटकनियां ॥

तुलसीदास अति आनंद देख के मुखारविंद ।
रघुवर छबि के समान रघुवर छबि बनियां ॥

मेरे राम

जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को
मिल जाये तरुवर कि छाया
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है
मैं जबसे शरण तेरी आया, मेरे राम

भटका हुआ मेरा मन था कोई
मिल ना रहा था सहारा
लहरों से लड़ती हुई नाव को
जैसे मिल ना रहा हो किनारा, मिल ना रहा हो किनारा
उस लड़खड़ाती हुई नाव को जो
किसी ने किनारा दिखाया
ऐसा ही सुख ...

शीतल बने आग चंदन के जैसी
राघव कृपा हो जो तेरी
उजियाली पूनम की हो जाएं रातें
जो थीं अमावस अंधेरी, जो थीं अमावस अंधेरी
युग- युग से प्यासी मरुभूमि ने
जैसे सावन का संदेस पाया
ऐसा ही सुख ...

जिस राह की मंज़िल तेरा मिलन हो
उस पर कदम मैं बढ़ाऊं
फूलों में खारों में, पतझड़ बहारों में
मैं न कभी डगमगाऊं, मैं न कभी डगमगाऊं
पानी के प्यासे को तक़दीर ने
जैसे जी भर के अमृत पिलाया
ऐसा ही सुख ...

उठ जाग मुसाफिर

उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो तू सोवत है
जो जागत है सो पावत है, जो सोवत है वो खोवत है

खोल नींद से अँखियाँ जरा और अपने प्रभु से ध्यान लगा
यह प्रीति करन की रीती नहीं प्रभु जागत है तू सोवत है.... उठ ...

जो कल करना है आज करले जो आज करना है अब करले
जब चिडियों ने खेत चुग लिया फिर पछताये क्या होवत है... उठ ...

नादान भुगत करनी अपनी ऐ पापी पाप में चैन कहाँ
जब पाप की गठरी शीश धरी फिर शीश पकड़ क्यों रोवत है... उठ ....

अच्छी है यही खुद्दारी क्या

अच्छी है यही खुद्दारी क्या
रख जेब में दुनियादारी क्या

जो दर्द छुपा के हंस दे हम
अश्कों से हुई गद्दारी क्या

हंस के जो मिलो सोचे दुनिया
मतलब है, छुपाया भारी क्या

वे देह के भूखे, क्या जाने
ये प्यार वफ़ा दिलदारी क्या

आए काँटे, कभी गुलाब आए

आए काँटे, कभी गुलाब आए
जो भी आए वो बेहिसाब आए

रंग उड़ जाए उनके चेहरे का
जब भी मेरी वफ़ा के बाब आए

अब्र दाना.ई का हो फिर ओझल
ज़िंदगी में अगर अज़ाब आए

दोस्त बन कर मिले या दुश्मन हो
सामने जब हो, बेनक़ाब आए

घर की छत में दरार जब हो पड़ी
ऐसे आलम में कैसे ख्वाब आए

इक लड़की पागल दीवानी, गुमसुम चुप-चुप सी रहती थी

इक लड़की पागल दीवानी, गुमसुम चुप-चुप सी रहती थी
बारिश सा शोर न था उसमें, सागर की तरह वो बहती थी
कोई उस को पढ़ न पाया, न कोई उसको समझा तब
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी

शख्स जो अक्सर दिखता था, उस दिल के झरोखे में
दर्द कई वो देता था, रखता था उसको धोखे में
जितने पल रुकता था आकर, वो उस में सिमटी रहती थी
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी

इक दिन ऐसा भी आया, वो आया पर दर नहीं खुला
दरवाज़े पर हँसता था जो, इक चेहरा उस को नहीं मिला
आँसू के हर्फ वहाँ थे, और था वफ़ा का किस्सा भी
तब जान गये आख़िर, सब कैसे वो टूटी, कहाँ मिटी

समझा तब लोगों ने उसको, कैसे वो ताने सहती थी
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी


बाद उसके खत भी मिले, जिनमें कई प्यार की बातें थी
सौगातें थी पाक दुआ की, भेजी चाँदनी रातें थी
लिखा था उसने, सम्हल के रहना,इतना भी मत गुस्सा करना
अब और कोई न सीखेगा, तुम से जीना, तुम पर मारना
अब वो पागल लड़की नहीं रही, जो तुम को खूब समझती थी
हर गुस्से को हर चुप को, आसानी से जो पढ़ती थी

समझा वो भी अब जाकर, क्या उसकी आँखें कहती थी
था प्यार बला का उससे ही, वो जिसके ताने सहती थी
इक लड़की पागल दीवानी, गुमसुम चुप-चुप सी रहती थी

इक लड़की पागल दीवानी, गुमसुम चुप-चुप सी रहती थी

इक लड़की पागल दीवानी, गुमसुम चुप-चुप सी रहती थी
बारिश सा शोर न था उसमें, सागर की तरह वो बहती थी
कोई उस को पढ़ न पाया, न कोई उसको समझा तब
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी

शख्स जो अक्सर दिखता था, उस दिल के झरोखे में
दर्द कई वो देता था, रखता था उसको धोखे में
जितने पल रुकता था आकर, वो उस में सिमटी रहती थी
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी

इक दिन ऐसा भी आया, वो आया पर दर नहीं खुला
दरवाज़े पर हँसता था जो, इक चेहरा उस को नहीं मिला
आँसू के हर्फ वहाँ थे, और था वफ़ा का किस्सा भी
तब जान गये आख़िर, सब कैसे वो टूटी, कहाँ मिटी

समझा तब लोगों ने उसको, कैसे वो ताने सहती थी
छोटी उदास आँखें उस की, न जाने क्या-क्या कहती थी


बाद उसके खत भी मिले, जिनमें कई प्यार की बातें थी
सौगातें थी पाक दुआ की, भेजी चाँदनी रातें थी
लिखा था उसने, सम्हल के रहना,इतना भी मत गुस्सा करना
अब और कोई न सीखेगा, तुम से जीना, तुम पर मारना
अब वो पागल लड़की नहीं रही, जो तुम को खूब समझती थी
हर गुस्से को हर चुप को, आसानी से जो पढ़ती थी

समझा वो भी अब जाकर, क्या उसकी आँखें कहती थी
था प्यार बला का उससे ही, वो जिसके ताने सहती थी
इक लड़की पागल दीवानी, गुमसुम चुप-चुप सी रहती थी

ऐसा नहीं कि हमको, मोहब्बत नहीं मिली

ऐसा नहीं कि हमको, मोहब्बत नहीं मिली
थी जिसकी आरज़ू वही, दौलत नहीं मिली

देखे अगर करे मेरे से, रश्क यार भी
सब कुछ मिला मगर वही, क़िस्मत नहीं मिली

घर को सजाते कैसे, ये लड़की हैं सीखती
ज़िंदा रहे तो कैसे, नसीहत नहीं मिली

क़िस्सा सुनाएँ किसको यहाँ, तेरे ज़ॉफ का
कहते हैं हम सभी से, कि आदत नहीं मिली

देखा गिरा के खुद को ही, क़दमों में उसके भी
“श्रद्धा” नसीब में तुझे क़ुरबत नहीं मिली

कितना है दम चराग़ में, तब ही पता चले

कितना है दम चराग़ में, तब ही पता चले
फानूस की न आस हो , उस पर हवा चले

लेता हैं इम्तिहान अगर, सब्र दे मुझे
कब तक किसी के साथ, कोई रहनुमा चले

नफ़रत की आँधियाँ कभी, बदले की आग है
अब कौन लेके झंडा –ए- अमनो-वफ़ा चले

चलना अगर गुनाह है, अपने उसूल पर
सारी उमर सज़ाओं का ही सिल सिला चले

खंजर लिये खड़ें हों अगर मीत हाथ में
“श्रद्धा” बताओ तुम वहाँ फ़िर क्या दुआ चले

क्या ख़ला हो जाएगा

मुश्किलें आई अगर तो, फ़ैसला हो जाएगा
कौन है पानी में कितने, सब पता हो जाएगा

दूरियाँ दिल की कभी जो, बढ़ भी जाएँ तो हुज़ूर
तुम बढ़ाना इक कदम, तय फासला हो जाएगा

लाए थे दुनियाँ में क्या तुम, लेके तुम क्या जाओगे
ये महल, ये रिश्ते-नाते, सब जुदा हो जाएगा

गर दुआ माँगोगे दिल से, और उस पे हो यक़ी
जब बुरा होना भी होगा, तो भला हो जाएगा

आरज़ू थी फूल इक, दामन में मेरे जाए खिल
सोचती हूँ न हुआ तो, क्या ख़ला हो जाएगा

ज़िंदगी का रास्ता होगा, बड़ा काँटों भरा
साथ तुम होगे तो “श्रद्धा” हौसला हो जाएगा

चलो कुछ बात करते हैं

चलो कुछ बात करते हैं
ज़ुबाँ, जज़्बात करते हैं

कही न दिन गुज़र जाए
मोहब्बत फिर न मर जाए
जो है एहसास ज़िंदा ,
तो अभी मुलाकात करते हैं
चलो कुछ बात करते हैं

रहे न मिलन अधूरा अब
मुझे तुम पूरा कर दो अब
मिला के लब से लब को ,
शबनमी ये रात करते हैं
चलो कुछ बात करते हैं

खलवतों में साँप जैसे
काटे हैं दिन पाप जैसे
अभी सूने से आँगन में,
सुरमई बरसात करते हैं
चलो कुछ बात करते हैं

तेरे हाथों से छूटी जो

तेरे हाथों से छूटी जो, मैं मिट्टी से हम वार हुई
हंसती-खिलती सी गुड़िया थी, इक धक्के से बेकार हुई

ज़ख्मों पर मरहम देने को, उसने तो हाथ बढाया था
मेरे जीवन की पीड़ा ही, इक दोधारी तलवार हुई

ये गर्म फ़ज़ा झुलसाएगी, पैरों में भी छाले लाएगी
देती थी जो साया मुझको, अब दूर वही दीवार हुई

दिन-रात दुआओं में मुझको, माँगा था खुदा से जिसने कभी
ये कुर्बत फिर मालूम नहीं, क्यूँ उसके दिल का भार हुई

जाने कब से खामोश थे लब, और सन्नाटा था जेहन में
इन दोनों की तन्हाई भी, महसूस मुझे इस बार हुई

जिसके कारण महका-महका मेरे जीवन का हर लम्हा
करती शुकराना हूँ उसका जिससे " श्रद्धा " इक प्यार हुई

नज़र नहीं आती

घटा से घिर गयी बदली, नज़र नहीं आती
बहा ले नीर तू उजली, नज़र नहीं आती

हवा में शोर ये कैसा सुनाई देता है
कहीं पे गिर गयी बिजली नज़र नहीं आती

है चारों ओर नुमाइश के दौर जो यारों
दुआ भी अब यहाँ असली नज़र नहीं आती

चमन में खार ने पहने, गुलों के चेहरे हैं
कली कोई कहाँ, कुचली नज़र नही आती

पहाड़ों से गिरा झरना तो यूँ ज़मीं बोली
ये दिल की पीर थी पिघली नज़र नही आती

मुझ सा ही दीवाना लगता है आईना

मुझ सा ही दीवाना लगता है आईना
पल में रोता, पल में हंसता है आईना

शायद कोई उम्मीद जगे अब सीने में
दरवाज़े को शब भर तकता है आईना

दिलवर हैं आ बैठे, पल भर को पास मेरे
इक दुल्हन जैसा अब सजता है आईना

गैरों के घर रोशन करने की है आदत
चुपचाप इसी धुन में जलता है आईना

राजा और प्यादा में अंतर करता है जग
हर इक को इक कद में रखता है आईना

आगाज़ ग़ज़ल का कर ही दो अब “श्रद्धा” तुम
उलझा-उलझा मुझको दिखता है आईना

मेरे दामन में काँटे हैं, मेरी आँखों में पानी हैं

मेरे दामन में काँटे हैं, मेरी आँखों में पानी हैं
मोहब्बत नाम जिसका है, ये उसने दी निशानी हैं

क़ज़ा ही लगती है आसां, अगर जीना जुदाई में
मिटाना है मुझे खुद को, उसे यादें मिटानी हैं

वफ़ा के वादे हैं टूटे, ज़रा सी बात पर रूठे
सज़ा बन जाती है कुरबत, अजब दिल की कहानी हैं

मिटा कर नक्श कदमों के, बने अंजान हम फिर से
मिले शायद कभी हंस कर, कि लंबी ज़िंदगानी हैं

कहाँ क़ुरबान होता है, कोई भी संग में “श्रद्धा”
ये बातें हीर रांझे की, हुई कब से पुरानी हैं

मैँने पहने हैँ कपड़े, धुले आज फिर

आप भी अब मिरे गम बढ़ा दीजिए
मुझको लंबी उमर की दुआ दीजिए

मैँने पहने हैँ कपड़े, धुले आज फिर
तोहमतें अब नई कुछ लगा दीजिए

रोशनी के लिए, इन अँधेरों में अब
कुछ नही तो मिरा दिल जला दीजिए

चाप कदमों की अपनी मैं पहचान लूँ
आईने से यूँ मुझको मिला दीजिए

गर मुहब्बत ज़माने में है इक ख़ता
आप मुझको भी कोई सज़ा दीजिए

चाँद मेरे दुखों को न समझे कभी
चाँदनी आज उसकी बुझा दीजिए

हंसते हंसते जो इक पल में गुमसुम हुई
राज़ "श्रद्धा" नमीं का बता दीजिए

मैँने पहने हैँ कपड़े, धुले आज फिर

आप भी अब मिरे गम बढ़ा दीजिए
मुझको लंबी उमर की दुआ दीजिए

मैँने पहने हैँ कपड़े, धुले आज फिर
तोहमतें अब नई कुछ लगा दीजिए

रोशनी के लिए, इन अँधेरों में अब
कुछ नही तो मिरा दिल जला दीजिए

चाप कदमों की अपनी मैं पहचान लूँ
आईने से यूँ मुझको मिला दीजिए

गर मुहब्बत ज़माने में है इक ख़ता
आप मुझको भी कोई सज़ा दीजिए

चाँद मेरे दुखों को न समझे कभी
चाँदनी आज उसकी बुझा दीजिए

हंसते हंसते जो इक पल में गुमसुम हुई
राज़ "श्रद्धा" नमीं का बता दीजिए

रब हो साजिश में शामिल तो क्या कीजिए

रब हो साजिश में शामिल तो क्या कीजिए ,
मौत बन जाए साहिल तो क्या कीजिए

उसके शानो पर रोना हुआ है फज़ूल ,
मेरा साजन है गाफिल तो क्या कीजिए

दर्द कहने का अंदाज़ है बस जुदा ,
गर जो थम जाए महफ़िल तो क्या कीजिए

तुम ने पाई बुलंदी नई भी तो क्या ,
हो खुशी ही न हासिल तो क्या कीजिए

फूल ही फूल थे इस फ़िज़ा में खिले
मैं ही काँटों के काबिल तो क्या कीजिए

सूखा फिर भी नहीं है, दरख़्त -ए- वफ़ा
गर हो मौसम ही बोझिल तो क्या कीजिए

लूटा कर जान दिलदारी नहीं क़ी

लूटा कर जान दिलदारी नहीं क़ी
ख़ता हम ने बड़ी भारी नहीं की

खुशी से प्यार है मुझ को भी लेकिन
कभी अश्कों से गद्दारी नहीं क़ी

बता के खुद को मुफ़लिस इस जहाँ में
कहीं रुसवा तो खुद्दारी नहीं की

चरागों को बुझाया गम छिपाने
ये सूरज की तरफ़दारी नहीं की

न हासिल थी तरक्की जब शगल में
कभी दिल पर खिज़ां तारी नहीं की

न कहिए मेरी चाहत को हवस यूँ
कोई हसरत भी बाज़ारी नहीं की

वक़्त करता कुछ दगा या, तुम दगा करते कभी

वक़्त करता कुछ दगा या, तुम दगा करते कभी
था जुदा होना ही हमको, हाथ को मलते कभी

आजकल रिश्तों में क्या है, लेने-देने के सिवा
खाली हाथों को यहाँ, दो हाथ न मिलते कभी

थक गये थे तुम जहाँ, वो आख़िरी था इम्तिहाँ
दो कदम मंज़िल थी तेरी, काश तुम चलते कभी

कुरबतें ज़ंज़ीर सी, लगती उसे अब प्यार में
चाहतें रहती जवाँ, गर हिज्र में जलते कभी

कल सिसक के हिन्दी बोली, ए मेरे बेटे कहो
क्यूँ शरम आती है तुमको, जो मुझे लिखते कभी

आजकल मिट्टी वतन की, रोज कहती है मुझे
लौट आओ ए परिंदे, शाम के ढलते कभी

वो धूप उजली सी, सुहानी शाम भी नहीं

वो धूप उजली सी, सुहानी शाम भी नहीं
परदेश में घर जैसा तो, आराम भी नहीं

सपने हुए है पूरे, गर साथी मिरे कहो
क्यूँ नज़रों में दिखता, खुशी का नाम भी नहीं

तू अपने हक़ में बोलने की सोच तो ज़रा
गूंगा नहीं तू, बहरी ये आवाम भी नहीं

जब इश्क़ दौलत के तराज़ू पे बिक गया
आती वफ़ा डर के ही लब-ए-बाम भी नहीं

हर एक को कहती हो अपना दोस्त तुम जहाँ
इक दोस्त ही मिलना, वहाँ पे आम भी नहीं

वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको

छोटी सी भी मज़बूरी, कर देगी जुदा हमको
वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको

रिश्तों की कसौटी पर, खुद को ही मिटा आए
हम चलते रहे तन्हा, थे साथ नहीं साए
अश्कों के सिवा उनसे, कुछ भी न मिला हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको

मौला ये बता दे मुझे, मेरा दिल क्यूँ सुलगता है
सूरज में जलन है गर, क्यूँ चाँद पिघलता है
साँसों के भी चलने से, लगता है बुरा हमको
वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको

सोचा कि मना लूँ उन्हें, मिन्नत भी कई कर लूँ
कदमों में गिर जाऊं, बाहों में उन्हें भर लूँ
होगा ये नही लेकिन, आसां जो लगा हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको

गिरते हुए कदमों की, आहट पर न जाना तुम
मर जाएँगे हम यूँ ही, न अश्क़ बहाना तुम
आँसू ये तेरे अब भी, लगते हैं सज़ा हमको
वो लौट न पाएँगे, मालूम न था हमको

है याद .........

है याद तुम्हारा कानों में, हौले से कुछ कह जाना
वादों से कैसे सीखे, इस भोले दिल को बहलाना

बहुत दिनों के बाद, सपने में तुम्हें फिर पाया है
तकिये को हमने आज फिर, सीने से अपने लगाया है
बहुत प्यारी सी बातें है, बहुत मीठी सी यादें है
तुम इस भोली नाज़ुक लड़की को, सपने से नहीं जगाना

है याद तुम्हारा कानों में, हौले से कुछ कह जाना
वादों से कैसे सीखे, इस भोले दिल को बहलाना

जागी-जागी रतियाँ गुज़री, तारों से बातें करते
थोड़ा सा उम्मीद में जीते, थोड़ा थोड़ा हम मरते
न आते हो मिलने तुम, न कोई खबरिया आती है
ख्वाबों में मिलकर तुमसे, है सीख लिया तुमको पाना

है याद तुम्हारा हौले से, कानों में कुछ कह जाना

Sunday, September 06, 2009

Jo Hum Pe gujerti hai..........

Jo Hum Pe gujerti hai Tanha kise Samjhayen

Tum bhi to Nahin Apne Jayen to Kidher Jayen!

Samjha Hai Na Samjhega is Gum ko Yahan Koi,

Bederdon ki Basti Hai, Hamdard Yahan Koi,

Jo Dil Hi Tumara hai Wo Hum Kise Dikhlain.

Jab Jane Bafa Teri Furket Na Satayegi

Wo Subah Kub Aayegi Wo Shaam Kab Aayegi

Kab Tek Dile Nadan Ko Hum Kaise Behlayen!

Aaja Ke Ulfet ki Mitne Ko Hain Tesveran,

Pehren hain Nigahon pe aur Paon(Feet) main Janjeeran,

Bus Main Nahin verna, Hum Urke Chale Aate.

Wednesday, June 10, 2009

Gallery mein baithe-baithe

Gallery mein baithe-baithe

Dekhta hu logo ko aate jaate hue



Aur sochta hu kabhi tere baare mein ae dost

Ki shayad ..us mod se, us darakht ke peeche se

tu ekdum se aayegi chalte hue,

aur paas aakar kahegi ..dekho mai aa gayi

Roj baat karte hai hum is tarah jaise

Ek dusre ke saamne hi baithe ho;

Aur lo aaj mai aa gayi yeh dekhne ki

Tum saamne kaise dikhte ho, kaise bolte ho..



Lagta hai kabhi ki us mod par nahi hai,

balki gallery mein mere pichhe hi khadi hai

Aur khade hokar dekh rahi hai ki,

Mere gallery se duniya kaisi dikhti hai



Phir shayad kamre mein ghusegi

Aur dhundegi ki maine,

aankho ka tera batay hua nussakha banaya ki nahi...

Phir room se bahar aakar kahegi -

"Tum bade laparwah ho, jao mai tumse baat nahi karti"



Phir agle hi pal kahegi ki mera itna khayal rakhte ho

aur apni jara bhi parwah nahi....



Sochta hu gallery mein baithe-baithe kabhi aie dost

ki tu us mod par us darakth ke peeche hi khadi hai,

Aur mujhe dekh rahi hai khamoshi se..aur soch rahi hai ki ...

Gallery mein baithkar soch raha hu tere baare mein.

तेरी यादें...................

जिंदगी दर्द की बाहों में सिमट आई है॥

एक अधूरी कहानी फिर इतिहास के पन्नो से पलट आई है

जो मैंने पुकारा तेरा नाम लेकर वीरानों में

मेरी ही आवाज़ दीवारों से वापस पलट आई है ...

सोचा था की चलूँगा अकेले ही, इन तनहा राहों में

पर हर राह में तेरी याद साथ ही आई है ...

Aayega jab baharon ka mausam

Aayegaa jab baharon ka mausam,
Phir Khilenge phool chaaro taraf pyaar ke;
Phir chalengi hawayein teri or se meri or,
Phir gayegi koyal nagme pyaar ke;

Konple phir khil aayi hai shaakh par kehna use,
Woh na samjha hai na samjhega, magar kehna use..

Kitni meethi hai teri baatein

aur kitna pyara hai tera yeh khayal
ki sochta hu kabhi-kabhi;
Dekh to lu tujhe ek najar...marne se pehle

Phir sochta hu...nahi!
Bas ehsaas hai tu ek khoobsurat sa
Jo mere ghamo ko door karta hai
our mere khamosh labo pe muskurahet bikherta he.

Aur tera yeh khoobsura ehsaas hi
Puri jindagi gujarne ke liye kafi hai..

..............एक ग़ज़ल मेरी तुम्हारी

Kuch lafz hum kahe, kuch lafz tum kaho
phir dono ke lafzon ko chalo milate hai
aur phir likhte hai.......
Ek Gazal meri-tumhari

Thami hui ek Gazal meri tumhari

Jaane kaha tum gayi
Na hawaye chalti hai
Na dhoop khilti hai
Na panchhi cheh-chahate hai
Na koyal gaati hai...
Foolon ne bhi khilna band kar diya hai

Jo tum nahi ho aas-paas
to saari fiza khaamosh hai
Dhundli dikhti hai tasveerein aankho mein
Lafz bhi cchhin gaye hai labon se
aur ruk gayi hai.....
ek gazal meri tumhari...............................

Sunday, May 10, 2009

जीवन की आपाधापी में

जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा -
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

कभी यूँ भी तो हो

~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~

कभी यूँ भी तो हो
दरिया का साहिल हो
पूरे चाँद की रात हो
और तुम आओ

कभी यूँ भी तो हो
परियों की महफ़िल हो
कोई तुम्हारी बात हो
और तुम आओ

कभी यूँ भी तो हो
ये नर्म मुलायम ठंडी हवायें
जब घर से तुम्हारे गुज़रें
तुम्हारी ख़ुश्बू चुरायें
मेरे घर ले आयें

कभी यूँ भी तो हो
सूनी हर मंज़िल हो
कोई न मेरे साथ हो
और तुम आओ

कभी यूँ भी तो हो
ये बादल ऐसा टूट के बरसे
मेरे दिल की तरह मिलने को
तुम्हारा दिल भी तरसे
तुम निकलो घर से

कभी यूँ भी तो हो
तनहाई हो, दिल हो
बूँदें हो, बरसात हो
और तुम आओ

कभी यूँ भी तो हो

अब अगर आओ तो

अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना

सिर्फ अहसान जताने के लिए मत आना

मैंने पलकों पे तमन्‍नाएँ सजा रखी हैं

दिल में उम्‍मीद की सौ शम्‍मे जला रखी हैं

ये हँसीं शम्‍मे बुझाने के लिए मत आना

प्‍यार की आग में जंजीरें पिघल सकती हैं

चाहने वालों की तक़बीरें बदल सकती हैं

तुम हो बेबस ये बताने के लिए मत आना

अब तुम आना जो तुम्‍हें मुझसे मुहब्‍बत है कोई

मुझसे मिलने की अगर तुमको भी चाहत है कोई

तुम कांई रस्‍म निभाने के लिए मत आना

आज मैंने अपना फिर सौदा किया /

आज मैंने अपना फिर सौदा किया

और फिर मैं दूर से देखा किया

जिन्‍दगी भर मेरे काम आए असूल

एक एक करके मैं उन्‍हें बेचा किया

कुछ कमी अपनी वफ़ाओं में भी थी

तुम से क्‍या कहते कि तुमने क्‍या किया

हो गई थी दिल को कुछ उम्‍मीद सी

खैर तुमने जो किया अच्‍छा किया

साँस लेना भी कैसी आदत है

साँस लेना भी कैसी आदत है
जीये जाना भी क्या रवायत है
कोई आहट नहीं बदन में कहीं
कोई साया नहीं है आँखों में
पाँव बेहिस हैं, चलते जाते हैं
इक सफ़र है जो बहता रहता है
कितने बरसों से, कितनी सदियों से
जिये जाते हैं, जिये जाते हैं

आदतें भी अजीब होती हैं

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते

वक़्त की शाख़ से लम्हें नहीं तोड़ा करते

जिस की आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते

शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा
जाने वालों के लिये दिल नहीं थोड़ा करते

तूने आवाज़ नहीं दी कभी मुड़कर वरना
हम कई सदियाँ तुझे घूम के देखा करते

लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो
ऐसी दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते

हिंदुस्तान में दो दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं

हिंदुस्तान में दो दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं

एक है जिसका सर नवें बादल में है
दूसरा जिसका सर अभी दलदल में है

एक है जो सतरंगी थाम के उठता है
दूसरा पैर उठाता है तो रुकता है

फिरका-परस्ती तौहम परस्ती और गरीबी रेखा
एक है दौड़ लगाने को तय्यार खडा है

‘अग्नि’ पर रख पर पांव उड़ जाने को तय्यार खडा है
हिंदुस्तान उम्मीद से है!

आधी सदी तक उठ उठ कर हमने आकाश को पोंछा है
सूरज से गिरती गर्द को छान के धूप चुनी है

साठ साल आजादी के…हिंदुस्तान अपने इतिहास के मोड़ पर है
अगला मोड़ और ‘मार्स’ पर पांव रखा होगा!!

हिन्दोस्तान उम्मीद से है..

वो जो शायर था चुप सा रहता था

वो जो शायर था चुप सा रहता था
बहकी-बहकी सी बातें करता था
आँखें कानों पे रख के सुनता था
गूँगी खामोशियों की आवाज़ें!
जमा करता था चाँद के साए
और गीली सी नूर की बूँदें
रूखे-रूखे से रात के पत्ते
ओक में भर के खरखराता था
वक़्त के इस घनेरे जंगल में
कच्चे-पक्के से लम्हे चुनता था
हाँ वही, वो अजीब सा शायर
रात को उठ के कोहनियों के बल
चाँद की ठोड़ी चूमा करता था

चाँद से गिर के मर गया है वो
लोग कहते हैं ख़ुदकुशी की है |

वक़्त को आते न जाते न गुज़रते देखा

वक़्त को आते न जाते न गुजरते देखा
न उतरते हुए देखा कभी इलहाम की सूरत
जमा होते हुए एक जगह मगर देखा है

शायद आया था वो ख़्वाब से दबे पांव ही
और जब आया ख़्यालों को एहसास न था
आँख का रंग तुलु होते हुए देखा जिस दिन
मैंने चूमा था मगर वक़्त को पहचाना न था

चंद तुतलाते हुए बोलों में आहट सुनी
दूध का दांत गिरा था तो भी वहां देखा
बोस्की बेटी मेरी ,चिकनी-सी रेशम की डली
लिपटी लिपटाई हुई रेशम के तागों में पड़ी थी
मुझे एहसास ही नहीं था कि वहां वक़्त पड़ा है
पालना खोल के जब मैंने उतारा था उसे बिस्तर पर
लोरी के बोलों से एक बार छुआ था उसको
बढ़ते नाखूनों में हर बार तराशा भी था

चूड़ियाँ चढ़ती-उतरती थीं कलाई पे मुसलसल
और हाथों से उतरती कभी चढ़ती थी किताबें
मुझको मालूम नहीं था कि वहां वक़्त लिखा है

वक़्त को आते न जाते न गुज़रते देखा
जमा होते हुए देखा मगर उसको मैंने
इस बरस बोस्की अठारह बरस की होगी

दूर सुनसान-से साहिल के क़रीब

एक जवाँ पेड़ के पास

उम्र के दर्द लिए वक़्त मटियाला दोशाला ओढ़े

बूढ़ा-सा पाम का इक पेड़, खड़ा है कब से

सैकड़ों सालों की तन्हाई के बद

झुक के कहता है जवाँ पेड़ से... ’यार!

तन्हाई है ! कुछ बात करो !’

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं
कुछ इक पल के
कुछ दो पल के

कुछ परों से हल्के होते हैं
बरसों के तले चलते-चलते
भारी-भरकम हो जाते हैं

कुछ भारी-भरकम बर्फ़ के-से
बरसों के तले गलते-गलते
हलके-फुलके हो जाते हैं

नाम होते हैं रिश्तों के
कुछ रिश्ते नाम के होते हैं
रिश्ता वह अगर मर जाये भी
बस नाम से जीना होता है

बस नाम से जीना होता है
रिश्ते बस रिश्ते होते हैं

मैं अपने घर में ही अजनबी हो गया हूँ आ कर

मैं अपने घर में ही अजनबी हो गया हूँ आ कर
मुझे यहाँ देखकर मेरी रूह डर गई है
सहम के सब आरज़ुएँ कोनों में जा छुपी हैं
लवें बुझा दी हैंअपने चेहरों की, हसरतों ने
कि शौक़ पहचनता ही नहीं
मुरादें दहलीज़ ही पे सर रख के मर गई हैं

मैं किस वतन की तलाश में यूँ चला था घर से
कि अपने घर में भी अजनबी हो गया हूँ आ कर

मुझको भी तरकीब सिखा

अकसर तुझको देखा है कि ताना बुनते

जब कोई तागा टूट गया या खत्म हुआ

फिर से बांध के

और सिरा कोई जोड़ के उसमे

आगे बुनने लगते हो

तेरे इस ताने में लेकिन

इक भी गांठ गिरह बुन्तर की

देख नहीं सकता कोई

मैनें तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता

लेकिन उसकी सारी गिराहें

साफ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे

नज़्म उलझी हुई है सीने में

नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई

आईना देख के तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई

पक गया है शज़र पे फल शायद
फिर से पत्थर उछलता है कोई

फिर नज़र में लहू के छींटे हैं
तुम को शायद मुघालता है कोई

देर से गूँजतें हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई

कुछ खो दिया है पाइके

कुछ
खो दिया है
पाइके

कुछ
पा लिया
गवाइके।

कहाँ
ले चला है
मनवा

मोहे
बाँवरी
बनाइके।

"Two..."

एक शरीर में कितने दो हैं,
गिन कर देखो जितने दो हैं।

देखने वाली आँखें दो हैं,
उनके ऊपर भवें भी दो हैं,
सूँघते हैं ख़ुश्बू को जिससे
नाक एक है, नथुने दो हैं।

भाषाएँ हैं सैकड़ों लेकिन,
बोलने वाले होंठ तो दो हैं,
लाखों आवाज़ें सुनते हैं,
सुनने वाले कान तो दो हैं।

कान भी दो, होंठ भी दो हैं,
दाएँ, बाएँ, कन्धे दो हैं,
दो बाहें, दो कोहनियाँ उनकी,
हाथ भी दो, अँगूठे दो हैं।

चिपचिपे दूध से नहलाते हैं

आंगन में खड़ा कर के तुम्हें ।

शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या

घोल के सर पे लुढ़काते हैं गिलसियाँ भर के


औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर

पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो

इक पथराई सी मुस्कान लिए

बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी ।


जब धुआँ देता, लगातार पुजारी

घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर

इक जरा छींक ही दो तुम,

तो यकीं आए कि सब देख रहे हो ।

वादे .........

आदतन तुम ने कर िदये वादे
आदतन हम ने ऐतबार िकया

तेरी राहों में हर बार रुक कर
हम ने अपना ही इन्तज़ार िकया

अब ना माँगेंगे िजन्दगी या रब
ये गुनाह हम ने एक बार िकया

खुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने में

खुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने में
एक पुराना खत खोला अनजाने में

जाना किसका ज़िक्र है इस अफ़साने में
दर्द मज़े लेता है जो दुहराने में

शाम के साये बालिस्तों से नापे हैं
चाँद ने कितनी देर लगा दी आने में

रात गुज़रते शायद थोड़ा वक्त लगे
ज़रा सी धूप दे उन्हें मेरे पैमाने में

दिल पर दस्तक देने ये कौन आया है
किसकी आहट सुनता है वीराने मे ।
कौरव कौन
कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है|
दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है|
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
जुए की लत है|
हर पंचायत में
पांचाली
अपमानित है|
बिना कृष्ण के
आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है|

आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

क्या खोया, क्या पाया जग में
मिलते और बिछुड़ते मग में
मुझे किसी से नहीं शिकायत
यद्यपि छला गया पग-पग में
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी
जीवन एक अनन्त कहानी
पर तन की अपनी सीमाएँ
यद्यपि सौ शरदों की वाणी
इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाज़ा खोलें!

जन्म-मरण अविरत फेरा
जीवन बंजारों का डेरा
आज यहाँ, कल कहाँ कूच है
कौन जानता किधर सवेरा
अंधियारा आकाश असीमित,प्राणों के पंखों को तौलें!
अपने ही मन से कुछ बोलें!

आराम करो

एक मित्र मिले, बोले, "लाला, तुम किस चक्की का खाते हो?
इस डेढ़ छँटाक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो।
क्या रक्खा है माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो।
संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।"
हम बोले, "रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो।
इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।

आराम ज़िन्दगी की कुंजी, इससे न तपेदिक होती है।
आराम सुधा की एक बूंद, तन का दुबलापन खोती है।
आराम शब्द में 'राम' छिपा जो भव-बंधन को खोता है।
आराम शब्द का ज्ञाता तो विरला ही योगी होता है।
इसलिए तुम्हें समझाता हूँ, मेरे अनुभव से काम करो।
ये जीवन, यौवन क्षणभंगुर, आराम करो, आराम करो।

यदि करना ही कुछ पड़ जाए तो अधिक न तुम उत्पात करो।
अपने घर में बैठे-बैठे बस लंबी-लंबी बात करो।
करने-धरने में क्या रक्खा जो रक्खा बात बनाने में।
जो ओठ हिलाने में रस है, वह कभी न हाथ हिलाने में।
तुम मुझसे पूछो बतलाऊँ -- है मज़ा मूर्ख कहलाने में।
जीवन-जागृति में क्या रक्खा जो रक्खा है सो जाने में।

मैं यही सोचकर पास अक्ल के, कम ही जाया करता हूँ।
जो बुद्धिमान जन होते हैं, उनसे कतराया करता हूँ।
दीए जलने के पहले ही घर में आ जाया करता हूँ।
जो मिलता है, खा लेता हूँ, चुपके सो जाया करता हूँ।
मेरी गीता में लिखा हुआ -- सच्चे योगी जो होते हैं,
वे कम-से-कम बारह घंटे तो बेफ़िक्री से सोते हैं।

अदवायन खिंची खाट में जो पड़ते ही आनंद आता है।
वह सात स्वर्ग, अपवर्ग, मोक्ष से भी ऊँचा उठ जाता है।
जब 'सुख की नींद' कढ़ा तकिया, इस सर के नीचे आता है,
तो सच कहता हूँ इस सर में, इंजन जैसा लग जाता है।
मैं मेल ट्रेन हो जाता हूँ, बुद्धि भी फक-फक करती है।
भावों का रश हो जाता है, कविता सब उमड़ी पड़ती है।

मैं औरों की तो नहीं, बात पहले अपनी ही लेता हूँ।
मैं पड़ा खाट पर बूटों को ऊँटों की उपमा देता हूँ।
मैं खटरागी हूँ मुझको तो खटिया में गीत फूटते हैं।
छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते छंदों के बंध टूटते हैं।
मैं इसीलिए तो कहता हूँ मेरे अनुभव से काम करो।
यह खाट बिछा लो आँगन में, लेटो, बैठो, आराम करो।

ऊँचाई

ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,
पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।
जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफन की तरह सफेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिल-खिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।
ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनन्दन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,
किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छांव में पलभर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफि नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बंटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।
जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

जरूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूंट सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।
भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।
धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इन्सानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,
किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई कांटा न चुभे,
कोई कलि न खिले।

न वसंत हो, न पतझड़,
हों सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलापन का सन्नाटा।

मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
गैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।
पायो जी म्हें तो राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरू, किरपा कर अपनायो॥
जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।
खरच न खूटै चोर न लूटै, दिन-दिन बढ़त सवायो॥
सत की नाँव खेवटिया सतगुरू, भवसागर तर आयो।
'मीरा' के प्रभु गिरिधर नागर, हरख-हरख जस पायो॥

आवाज़ें

एक पुरानी किताब के पन्नों पे आज उंगली चलाई
जाने कहाँ से कुछ धीमी आवाज़ें आई

आवाज़ एक जानी पहचानी सी
आवाज़ें कुछ बरसों पुरानी सी

एक हँसी थी दूर से आती हुई
गूंजती थी दिल को भरमाती हुई

कितनी ही बातें थी उस आवाज़ में
जाने क्या कह गई अपने ही अंदाज़ में

एक संगीत खामोशी की नींद तोड़ता हुआ
पुरानी ग़ज़लों का दुशाला ओढ़ता हुआ

कुछ सवाल उठे उचक कर ऐसे
नींद से कोई बच्चा जागता हो जैसे

बूढ़ी पंखुड़ियों से बुझी राख टटोल रहा था
उस किताब में दबा एक गुलाब बोल रहा था

मेरा हाथ पकड़ कर वो मुस्कुराने लगा
किन्ही बिछ्ड़े रास्तों पर ले जाने लगा

कुछ सोच कर मैंने उसका हाथ झटक दिया
किताब बंद कर उसका मुंह भी बंद कर दिया

पतझड़ की पगलाई धूप

भोर भई जो आँखें मींचे
तकिये को सिरहाने खींचे
लोट गई इक बार पीठ पर
ले लम्बी जम्हाई धूप
अनमन सी अलसाई धूप

पोंछ रात का बिखरा काजल
सूरज नीचे दबा था आंचल
खींच अलग हो दबे पैर से
देह आंचल सरकाई धूप
यौवन ज्यों सुलगाई धूप

फुदक फुदक खेले आंगन भर
खाने-खाने एक पांव पर
पत्ती-पत्ती आंख मिचौली
बचपन सी बौराई धूप
पतझड़ की पगलाई धूप

Wednesday, May 06, 2009

मेरी वफायें याद करोगे

मेरी वफायें याद करोगे
रो'ओगे, फरयाद करोगे

मुझको तो बरबाद किया है
और किसे बरबाद करोगे

हम भी हँसेंगे तुम पर एक दिन
तुम भी कभी फरयाद करोगे

महफ़िल की महफ़िल है गमगीन
किस किस का दिल शाद करोगे

दुश्मन तक को भूल गए हो
मुझको तुम क्या याद करोगे

ख़त्म हुई दुशनाम-तराजी
या कुछ और इरशाद करोगे

जा कर भी नाशाद किया था
आ कर भी नाशाद करोगे

छोडो भी तासीर की बातें
का तक उस को याद करोगे

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता


कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आस्माँ नहीं मिलता


बुझा सका ह भला कौन वक़्त के शोले
ये ऐसी आग है जिसमें धुआँ नहीं मिलता


तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो
जहाँ उमीद हो सकी वहाँ नहीं मिलता


कहाँ चिराग़ जलायें कहाँ गुलाब रखें
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता


ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं
ज़बाँ मिली है मगर हमज़बाँ नहीं मिलता


चिराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है
खुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता

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कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता


जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है
ज़ुबाँ मिली है मगर हमज़ुबा नहीं मिलता


बुझा सका है भला कौन वक़्त के शोले
ये ऐसी आग है जिस में धुआँ नहीं मिलता


तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो
जहाँ उम्मीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी


हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तनहाईयों का शिकार आदमी


सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का ख़ुद मज़ार आदमी


हर तरफ़ भागते दौडते रास्ते
हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी


रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ
हर नए दिन नया इंतज़ार आदमी


ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र दर सफ़र
आख़िरी साँस तक बेक़रार आदमी

कभी कभी


कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है


कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी


अजब न था के मैं बेगाना-ए-अलम रह कर
तेरे जमाल की रानाईयों में खो रहता
तेरा गुदाज़ बदन तेरी नीमबाज़ आँखें
इन्हीं हसीन फ़सानों में महव हो रहता


पुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियाँ ज़माने की
तेरे लबों से हलावट के घूँट पी लेता
हयात चीखती फिरती बरहना-सर, और मैं
घनेरी ज़ुल्फ़ों के साये में छुप के जी लेता


मगर ये हो न सका और अब ये आलम है
के तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्तजू भी नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िन्दगी जैसे
इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं


ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले
गुज़र रहा हूँ कुछ अनजानी रह्गुज़ारों से
महीब साये मेरी सम्त बढ़ते आते हैं
हयात-ओ-मौत के पुरहौल ख़ारज़ारों से


न कोई जादह-ए-मंज़िल न रौशनी का सुराग़
भटक रही है ख़लाओं में ज़िन्दगी मेरी
इन्हीं ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खोकर
मैं जानता हूँ मेरी हमनफ़स मगर फिर भी


कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा


ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
क़ाफिला साथ और सफर तन्हा

अपने साये से चौंक जाते हैं
उम्र गुज़री है इस कदर तन्हा

रात भर बोलते हैं सन्नाटे
रात काटे कोई किधर तन्हा

दिन गुज़रता नहीं है लोगों में
रात होती नहीं बसर तन्हा

हमने दरवाज़े तक तो देखा था
फिर न जाने गए किधर तन्हा

मौत तू एक कविता है


मौत तू एक कविता है,
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको

डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुचे
दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब
ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन

जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब साँस आऐ
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको

क्यों डरें ज़िन्दगी में क्या होगा


क्‍यों डरें जिन्‍देगी में क्‍या होगा
कुछ ना होगा तो तजरूबा होगा

हँसती आँखों में झाँक कर देखो
कोई आँसू कहीं छुपा होगा

इन दिनों ना उम्‍मीद सा हूँ मैं
शायद उसने भी ये सुना होगा

देखकर तुमको सोचता हूँ मैं
क्‍या किसी ने तुम्‍हें छुआ होगा

Tuesday, May 05, 2009

अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना


अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना

सिर्फ अहसान जताने के लिए मत आना

मैंने पलकों पे तमन्‍नाएँ सजा रखी हैं

दिल में उम्‍मीद की सौ शम्‍मे जला रखी हैं

ये हँसीं शम्‍मे बुझाने के लिए मत आना

प्‍यार की आग में जंजीरें पिघल सकती हैं

चाहने वालों की तक़बीरें बदल सकती हैं

तुम हो बेबस ये बताने के लिए मत आना

अब तुम आना जो तुम्‍हें मुझसे मुहब्‍बत है कोई

मुझसे मिलने की अगर तुमको भी चाहत है कोई

तुम कांई रस्‍म निभाने के लिए मत आना

मुझको भी तरकीब सिखा


अकसर तुझको देखा है कि ताना बुनते
जब कोई तागा टूट गया या खत्म हुआ
फिर से बांध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमे
आगे बुनने लगते हो
तेरे इस ताने में लेकिन
इक भी गांठ गिरह बुन्तर की
देख नहीं सकता कोई
मैनें तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिराहें
साफ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे

चाँदनी छत पे चल रही होगी


चाँदनी छत पे चल रही होगी
अब अकेली टहल रही होगी

फिर मेरा ज़िक्र आ गया होगा
वो बर्फ़-सी पिघल रही होगी

कल का सपना बहुत सुहाना था
ये उदासी न कल रही होगी

सोचता हूँ कि बंद कमरे में
एक शम-सी जल रही होगी

तेरे गहनों सी खनखनाती थी
बाजरे की फ़सल रही होगी

जिन हवाओं ने तुझ को दुलराया
उन में मेरी ग़ज़ल रही होगी

दीवान-ए-ग़ालिब


थी खबर गर्म कि ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्ज़े
देखने हम भी गए थे, पर तमाशा ना हुआ

----- ----- -----

पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या

----- ----- -----

इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के

आओ फिर नज़म कहें...


आओ फिर नज़म कहें,
फिर किसी दर्द को सहला के सुजा लें आंखें,
फिर किसी दुखती रग से छुआ दे नश्तर,
या किसी भूली हुई राह पे मुड़कर,
एक बार नाम लेकर किसी हमनाम को अवाज़ ही दे लें,
फिर कोई नज़्म कहें

नज़म उलझी हुई है सीने में...

नज़म उलझी हुई है सीने में,
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर,
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह,
लफ़्ज़ कागज़ पे बैठते ही नहीं,
कब से बैठा हूं मैं जानम,
सादे कागज़ पे लिखके नाम तेरा,

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है,
इससे बहतर भी नज़्म कया होगी।।

ज़िन्दिगी यूं हुई बसर तनहा

ज़िन्दिगी यूं हुई बसर तनहा
काफ़िला साथ और सफ़र तनहा

अपने साये से चौंक जाते हैं
उमर गुज़री है इस कदर तनहा

रात भर बोलते हैं सन्नाटे
रात काटे कोई किधर तनहा

दिन गुज़रता नहीं है लोगों में
रात होती नहीं बसर तनहा

हमने दरवाज़े तक तो देखा था
फिर ना जाने गये किधर तनहा

सांस लेना भी कैसी आदत है

सांस लेना भी कैसी आदत है
जिये जाना भी कया रवायत है
कोई आहट नहीं बदन में कहीं
कोई साया नहीं है आंखों में
पांव बेहिस हैं, चलते जाते हैं
इक सफ़र है जो बहता रहता है
कितने बरसों से, कितनी सदियों से
जिये जाते हैं, जिये जाते हैं

आदतें भी अजीब होती हैं

रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने

रात भर सर्द हवा चलती रही

रात भर हमने अलाव तापा

मैंने माज़ी से कई खुश्क सी शाखें काटी

तुमने भी गुजरे हुए लमहों के पत्ते तोड़े

मैंने जेबों से निकाली सभी सूखी नज़्में

तुमने भी हाथों से मुरझाए हुए ख़त खोले

अपनी इन आँखों से मैंने कई मांजे तोड़े

और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकी

तुमने भी पलकों पे नमी सूख गई थी, सो गिरा दी


रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हमको

काट के डाल दिया जलते अलावों में उसे

रात भर फूकों से हर लौ को जगाए रखा

और दो जिस्मों के ईंधन को जलाए रखा

रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने..

दस्तक - *****

सुबह सुबह इक ख्वाब कि दस्तक पर दरवाज़ा खोला,
देखा सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आये हैं
आंखों से मायूस थे सारे

चेहरे सारे सुने सुनाये
पांव धोये, हाथ धुलाये
आंगन में आसन लगवाये।।।
और तन्दूर पे मक्की के कुछ मोटे मोटे रोटे पकाये
पोटली में मेहमान मेरे
पिछले सालों की फ़सलों का गुड़ लाये थे

आंख खुली तो देखा घर में कोई नहीं था
हाथ लगकर देखा तो तन्दूर अभी तक बुझा नहीं था
और होथों पे मीठे गुड़ का ज़ायका अब तक चिपक रहा था

ख्वाब था शायद!
ख्वाब ही होगा! !
सरहद पर कल रात, सुना है, चली थी गोली
सरहद पर कल रात, सुना है
कुछ ख्वाबों का खून हुआ है

मोड़ तक जाने की हिम्मत नहीं होती मुझको

मोड़ पे देखा है वो बूढ़ा-सा एक पेड़ कभी ?
मेरा वकिफ़ है, बहुत सालों से मैं उसे जानता हूं

जब मैं छोटा था तो इक आम उठाने के लिये
परली दीवार से कन्धों पे चढ़ा था उसके
जाने दुखती हुई किस शाख से जा पांव लगा
धाड़ से फेंक दिया था मुझे नीचे उसने
मेंने खुन्नस में बहुत फेंके थे पत्थर उस पर

मेरी शादी पे मुझे याद है शाखें देकर
मेरी वेदी का हवन गर्म किया था उसने
और जब हामला थी 'बीबा' तो दोपहर में हर दिन
मेरी बीवी की तरफ़ कैरियां फेंकी थी इसी ने
वक्त के साथ सभी फूल, सभी पत्ती गये

तब भी जल जाता था जब मुन्ने से कहती 'बीबा'
'हां, उसी पेड़ से आया है तू, पेड़ का फल है'
अब भी जल जाता हूं। जब मोड़ से गुजरते में कभी
खांसकर कहता है, 'क्यों, सर के सभी बाल गये?'

'सुबह से काट रहे हैं वो कमेटी वाले
मोड़ तक जाने की हिम्मत नहीं होती मुझको'

देश की मिट्टी


मुझे याद आती है
अपने देश की मिट्टी की खुशबू
मुझे याद आती

कभी बहलाती है
कभी तड़पाती

मुझे याद आती है,
अपने देश की मिट्टी
अपने देश की मिट्टी की खुशबू

बीते पल छूने लगे हैं दिल को ऐसे
दोस्त रखे हाथ कंधे पे जैसे
कैसी ये किरणें सी छन रही हैं
कैसी तसवीरें सी बन रही हैं
कितने मौसम याद में हैं आते जाते
बारिश आई खुल गये हैं काले छाते
दिन हैं अलसाये हुये जो आई गरमी
सर्दियों की धूप में है कैसी नरमी
पल पल इक समय की नदिया है जो बहती जाती है
अपने देश की मिट्टी की खुश्बू
मुझे याद आती है

पिघले तनहाइयों के हैं जो अँधेरे
जगमगाने से लगे हैं कितने चेहरे
एक लोरी है इक लाल बिंदिया
लौट आई है मेरे बचपन कि निंदिया
वो कोई इकतारे पे कब से गा रहा है
कोइ आँचल जाने कयूँ लहरा रहा है
हर घड़ी नई बात इक याद आ रही है
दिल में पगडण्डी सी जैसे बन गई है
ये पगडण्डी मेरे दिल से मेरे देश जाती है
अपने देश की मिट्टी की खुशबू
मुझे याद आती है
अपने देश कि मिट्टी की खुशबू
मुझे याद आती है

बाप का बीस लाख फूँक कर


लोकल ट्रेन से उतरते ही
हमने सिगरेट जलाने के लिए
एक साहब से माचिस माँगी
तभी किसी भिखारी ने
हमारी तरफ हाथ बढ़ाया
हमने कहा-
"भीख माँगते शर्म नहीं आती?"
वो बोला-
"माचिस माँगते आपको आयी थी क्‍या"
बाबूजी! माँगना देश का करेक्‍टर है
जो जितनी सफाई से माँगे
उतना ही बड़ा एक्‍टर है
ये भिखारियों का देश्‍ा है
लीजिए! भिखारियों की लिस्‍ट पेश है
धंधा माँगने भिखारी
चंदा माँगने वाला
दाद माँगने वाला
औलाद माँगने वाला
दहेज माँगने वाला
नोट माँगने वाला
और तो और
वोट माँगने वाला
हमने काम माँगा
तो लोग कहते हैं चोर है
भीख माँगी तो कहते हैं
कामचोर है
उनमें कुछ नहीं कहते
जो एक वोट के लिए
दर-दर नाक रगड़ते हैं
घिस जाने पर रबर की खरीद लाते हैं
और उपदेशों की पोथियाँ खोलकर
महंत बन जाते हैं।
लोग तो एक बिल्‍ला से परेशान हैं
यहाँ सैकड़ों बिल्‍ले
खरगोश की खाल में देश के हर कोने में विराजमान हैं।


हम भिखारी ही सही
मगर राजनीति समझते हैं
रही अखबार पढ़ने की बात
तो अच्‍छे-अच्‍छे लोग
माँग कर पढ़ते हैं
समाचार तो समाचार
लोग बाग पड़ोसी से
अचार तक माँग लाते हैं
रहा विचार!
तो वह बेचारा
महँगाई के मरघट में
मुद्दे की तरह दफन हो गया है।
समाजवाद का झंडा
हमारे लिए कफन हो गया है
कूड़ा खा रहे हैं और बदबू पी रहे हैं
उनका फोटो खींचकर
फिल्‍म वाले लाखों कमाते हैं
झोपड़ी की बात करते हैं
मगर जुहू में बँगला बनवाते हैं।
हमने कहा "फिल्‍म वालों से
तुम्‍हारा क्‍या झगड़ा है ?"
वो बोला-
"आपके सामने भिखारी नहीं
भूतपूर्व प्रोड्यूसर खड़ा है
बाप का बीस लाख फूँक कर
हाथ में कटोरा पकड़ा!"
हमने पाँच रुपए उसके
हाथ में रखते हुए कहा-
"हम भी फिल्‍मों में ट्राई कर रहे हैं !"
वह बोला, "आपकी रक्षा करें दुर्गा माई
आपके लिए दुआ करूँगा
लग गई तो ठीक
वरना आपके पाँच में अपने पाँच मिला कर
दस आपके हाथ पर धर दूँगा !"

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती


लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्ही चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना ना अखरता है
आख़िर उसकी महनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

डूबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नही सहज ही मोती गहरे पानी में ,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
मुठी उसकी खाली हर बार नहीं होती ,
कोशिश करने वालों की हार नही होती

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो
जब तक सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़कर मत भागो तुम
कुछ किए बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती.

बम्‍बई: यहाँ ख्‍वाब भी टाँगों पे चलते है - गुलज़ार


बड़ी लम्‍बी-सी मछली की तरह लेटी हुई पानी में ये नगरी
कि सर पानी में और पाँव जमीं पर हैं
समन्‍दर छोड़ती है, न समन्‍दर में उतरती है
ये नगरी बम्‍बई की...
जुराबें लम्‍बे-लम्‍बे साह‍िलों की, पिंडलियों तक खींच रक्‍खी है
समन्‍दर खेलता रहता है पैरों से लिपट कर
हमेशा छींकता है, शाम होती है तो 'टाईड' में।

यहीं देखा है साहिल पर
समन्‍दर ओक में भर के
'जोशान्‍दे' की तरह हर रोज पी जाता है सूरज को
बड़ा तन्‍दरुस्‍त रहता है
कभी दुबला नहीं होता!
कभी लगता है ये कोई तिलिस्‍मी-सा जजीरा है
जजीरा बम्‍बई का...

किसी गिरगिट की चमड़ी से बना है आसमाँ इसका
जो वादों की तरह रंगत बदलता है
'कसीनो' में रखे रोले (Roulette) की सूरत चलता रहता है!
कभी इस शहर की गर्दिश नहीं रुकती
बसे 'बियेरिंग' लगे हैं
किसी 'एक्‍सेल' पे रक्‍खा है।

तिलिस्‍मी शहर के मंजर अजब है
अकेले रात को निकलो, सिया साटिन की सड़कों पर
तिलिस्‍मी चेहरे ऊपर जगमगाते 'होर्डिंग' पर झूलते हैं
सितारे झाँकते हैं, नीचे सड़कों पर
वहाँ चढ़ने के जीने ढूँढने पड़ते हैं
पातालों में गुम होकर।

यहाँ जीना भी जादू है...
यहाँ पर ख्‍वाब भी टाँगों पे चलते है
उमंगें फूटती हैं, जिस तरह पानी में रक्‍खे मूंग के दाने
चटखते है तो जीभें उगने लगती हैं
यहाँ दिल खर्च हो जाते हैं अक्‍सर...कुछ नहीं बचता
सभी चाटे हुए पत्‍तल हवा में उड़ते रहते हैं
समन्‍दर रात को जब आँख बन्‍द करता है, ये नगरी
पहन कर सारे जेवर आसमाँ पर अक्‍स अपना देखा करती है

कभी सिन्‍दबाद भी आया तो होगा इस जजीरे पर
ये आधी पानी और आधी जमीं पर जिन्‍दा मछली
देखकर हैराँ हुआ होगा!!

न्यूयार्क : तुम्हारे शहर में

तुम्हारे शहर में ए दोस्त
क्यूं कर च्युंटियों के घर नहीं हैं
कहीं भी चीटियां नहीं देखी मैने

अगरचे फ़र्श पे चीनी भी डाली
पर कोइ चीटीं नज़र नहीं आयी
हमारे गांव के घर में तो आटा डालते हैं, गर
कोइ क़तार उनकी नज़र आये

तुम्हारे शहर में गरचे..
बहुत सब्ज़ा है, कितने खूबसूरत पेड़ हैं
पौधे हैं, फूलों से भरे हैं

कोई भंवरा मगर देखा नहीं भंवराये उन पर

मेरा गांव बहुत पिछड़ा हुआ है
मेरे आंगन के बरगद पर
सुबह कितनी तरह के पंछी आते हैं
वे नालायक, वहीं खाते हैं दाना
और वहीं पर बीट करते हैं

तुम्हारे शहर में लेकिन
हर इक बिल्डिंग, इमारत खूबसूरत है, बुलन्द है
बहुत ही खूबसूरत लोग मिलते हैं

मगर ए दोस्त जाने क्यों..
सभी तन्हा से लगते हैं
तुम्हारे शहर में कुछ रोज़ रह लूं
तो बड़ा सुनसान लगता है..

Heart Touch...

मकां की ऊपरी मंज़िल पे अब कोई नहीं रहता,
वो कमरे बन्द हैं कब से
जो चौबीस सीढियां उन तक पहुंचती थी,
वो अब ऊपर नहीं जाती.

मकां की ऊपरी मंज़िल पर
अब कोई नहीं रहता

वहां पर कमरों मे इतना याद है मुझको,
खिलौने एक पुरानी टोकरी में भर के रखे थे,
बहुत से तो उठाने, फ़ेंकने, रखने में चूरा हो गये थे.

वहां एक बालकनी भी थी,
जहां एक बेंत का झूला लटकता था.
मेरा एक दोस्त था 'तोता',
वो रोज़ आता था,
उसको हरी मिर्ची खिलाता था,
उसी के सामने छत थी जहां
एक मोर बैठा, आसमान पर
रात भर मीठे सितारे चुगता रहता था.

मेरे बच्चों ने वो देखा नहीं,
वो नीचे की मंज़िल पे रहते हैं,
जहां पर पियानो रखा है,
पुरानी पारसी स्टाइल का
फ़्रेजर से खरीदा था.
मगर कुछ बेसुरी आवाज़ें करता है,
कि उसकी रीड्स सारी हिल गयी हैं,
सुरों पर दूसरे सुर चढ गये हैं


उसी मंज़िल पे एक पुश्तैनी बैठक थी...
जहां पुरखों की तस्वीरें लटकती थी
मैं सीधा करता रहता था
हवा फ़िर टेढा कर जाती
बहू को मूंछो वाले सारे पुरखे
’क्लिशे’ लगते थे,
मेरे बच्चों ने आखिर उनको कीलों से उतारा
पुराने न्यूज़पेपर में
उन्हें महफ़ूज़ करके रख दिया था,
मेरा एक भांजा ले जाता है
फ़िल्मों में कभी सेट पर लगाता है
किराया मिलता है उनसे.

मेरी मंज़िल पे मेरे सामने मेहमानखाना है
मेरे पोते कभी अमरिका से आयें तो रुकते हैं
अलग साइज़ में आते हैं,
जितनी बार आते है
खुदा जाने वो ही आते हैं या
हर बार कोई दूसरा आता है

वो एक कमरा जो पीछे की तरफ़ बन्द है
जहां बत्ती नहीं जलती
वहां एक रोज़री रखी है वो उस से महकता है
वहां वो दाई रहती थी
जिसने तीन बच्चों को बड़ा करने में
अपनी उम्र दे दी थी
मरी तो मैने दफ़नाया नहीं,
महफ़ूज़ करके रख दिया उसे

और उसके बाद एक दो सीढ़ियां है
नीचे तहखाने में जाती है
जहां खामोशी रोशन है,
सुकूं सोया है
बस इतनी सी पहलू में जगह रखकर
कि जब मैं सीढ़ियों से नीचे आऊं
तो उसी के पहलू में, बाजुओं पर सर रख कर गले लग जाऊं
सो जाऊं

मकां की ऊपरी मंज़िल पे अब कोई नहीं रहता....
मेरी गली से वो जब भी गुजरता होगा
मोड़ पे जाके कुछ देर ठहरता होगा
भूल जाना मुझको इतना आसान तो न होगा
दिल मैं कुछटूट के तो बिखरता होगा
साथ देखे थे जो उन ख्वाबों का कारवा
गुबा बनकर उसकी आँखों में उभरता होगा
कोई जब चूमता होगा उसे बांहों में लेकर
मेरा प्यार बदन में उसके सिहरता होगा
उसकी जुल्फों को मेरी उँगलियाँ दुलारती होंगी
सामने आईने के वो जब भी संवारता होगा
दर्द जब भी देता होगा ये संगदिल ज़माना
वो बेवफा इस मन को याद करता होगा

Tuesday, April 28, 2009

"हुई है रात तो सुबह भी जरुर होगी धैर्यरख
अपने कर्तव्यों के साथ आगे बढ़ हौसला रख"

Monday, April 27, 2009

आंख से हम जब कभी आंसू बहाने लग गए
बारहा फिर आप हमको याद आने लग गए

वक़्त पर मिलता नहीं है कोई भी अपने करीब
अपने अपने काम में सारे दीवाने लग गए

हमसे तुमसे जो हुई है जाने अनजाने खता
बस इसी उलझन को सुलझाते ज़माने लग गए

हम इन्ही ख्वाबों ख्यालों में ही डूबे रह गए
क्या पता कब चान्द तारे मुस्कराने लग गए

बस हमें तो रोज का अखबार समझा आपने
पढ़ लिया फिर रख दिया कुछ गुनगुनाने लग गए

इस तरह जज्बात ने झकझोड़ कर दिल रख दिया
आप शीशा तोड़कर क्यूं मुस्कराने लग गए

जब कभी सोने के पिंजरे में घुटा तोते का दम
बाग के सारे नज़ारे याद आने लग गए.........

--
Setu Gupta

Dosti

मैं नहीं जानता की एक दोस्त की सोच दुसरे दोस्त से क्या क्या चाहती है मैं बस यही जानता हूँ अच्छा दोस्त वो जो दोस्ती को निभाना जानता हो उसे पढना जानता हो उसकी भावनाओं की इज्जत करना जानता हो उसके साथ- साथ हर पल की जिन्दगी मैं खडा रहता हो

--
Setu Gupta

Waqt,,,,,,,,,

बस एक लम्हा ही काफ़ी है
भूल जाने को या याद आने को
मानो जैसे किसी के जादू सा कर दिया हो
चुटकी बजी सुई हिली और बस
छू मंतर ही हो जाते हैं ना
तन्हाई में बैठे बैठे
या भीड़ में ही सही कहीं
लेकिन जब एक दम से खो से जाते हैं
किसी और दुनिया में निकल जाते हैं
कुछ होश नहीं होता किसी का
पलक झपकी या नही.. साँस ली की नही
खा पी रहे हो या नहीं..
मानो खुली आँखों से
सोते हुए खाब देख रहे हैं
फिर क्या होना है..

चाय में डुबोया हुआ बिस्कुट जब
मुँह तक आते आते गोद में गिर जाता है
हड़बड़ा के होश में आते हैं
और लगभग भूल ही जाते हैं कि
कहाँ थे....क्य सोच रहे थे
रह जाती है तो एक मुस्कान या गहरी साँस
कि चलो बैठे बिठाए घूम आए...
है ना...!

--
Setu Gupta

Na tum jano na Hum

कितने बच्चे सोते हैं रोज़ रखकर पेट में लातें अपनी
बना नहीं अभी कच्चा है कह देती है रोकर जननी ।
भोर हुए उठते हैं जब पाते हैं दो ही सिकी रोटी
रोटी दो , बच्चे हैं छ: , भूख से बच्ची छोटी रोती,
कंठ डुबोकर आंसुओं में थककर बच्चे सो जाते हैं ।
सपनों में भी देखकर रोटी रोटी-रोटी चिल्लाते हैं ॥
एक तरफ है पैसों की कमी , एक तरफ खूब बर्बादी है
एक भाई हँसे रोये दूजा रोये भला ये कैसी आज़ादी है ।
अपनी जिद की खातिर कुछ लोग नित पानी सा धन बहाते हैं
तनिक-तनिक सी बात-बात पर देखो उत्सव मनाते हैं ।
नहीं कुछ परवाह औरों की इनको तो जश्न मनाना है ।
जो भरे हुए मस्त बादल हैं उनको ही नीर पिलाना है ॥
तुम चाहते हो उत्सव करना तो रोतों को हँसियाँ बाँटो
जो पानी पीकर जीते हैं तुम उनको रोटी बाँटो ।
हम अलग -अलग चलेंगे तो दुनिया हमको खा जायेगी
मिटटी के मोल बिक जायेंगे , दासता फ़िर से छा जायेगी
मिलकर सबको निज देश का फ़िर भाग्य बनाना होगा
जो घिरे हुए हैं अन्धेरे में उन्हें दीप दिखाना होगा ।
--
Setu Gupta

Zindgi

"मेरी जिन्दगी है, या समुंदरी तूफानों से घिरी कोई नाव,
जो डूब भी सकती है, और किनारे भी लग सकती है,
इन हालातों मैं जीना मौत से भी बदतर है,
मेरी सांसे मेरे सीने मैं चुभता हुआ नश्तर हैं,
हम तो जिन्दगी को बस खुअवो मैं ही देखा करते हैं,
इसीलिए हर रोज़ खुदा से मरने की दुआ करते हैं,
लेकिन मौत भी इतनी आसानी से कहाँ मिलती है,
न जाने हमें किस बात की सजा मिलती हैं ,
न जाने हमें किस बात की सजा मिलती है......

"मेरी जिन्दगी धुआं से हो गयी है,
शायद मुझसे मेरी मंजिल खो गयी है,
ए रास्ता न जाने किधर को जाता है,
या यूँ ही भटकते रहना जिन्दगी का तकाजा है
जिस मोड़ को भी समझा यही मंजिल है मेरी
वहां पहुंचे तो पाया रास्ता और भी लम्बा है,
न जाने ए शाम कब सुहानी होगी,
या यूँ ही बेखयाली में तेरा ख़याल आता है,
सहारे तो हम उसके भी जी लेंगे,
मगर तेरा एहसास कुछ ज्यादा है.
--
Setu Gupta

Ram Ram

Thumak chalat raamachandra
Thumak chalat raamachandra
Baajat painjaniyaan

Kilaki kilaki uthat dhaay girat bhuumi latapataay
Dhaay maat god let dasharath kii raniyaan
T

humak chalat raamachandra
Thumak chalat raamachandra
Baajat painjaniyaan

Aanchal raj ang jhaari vividh bhaanti so dulaari
Tan man dhan vaari vaari kahat mridu bachaniyaan

Thumak chalat raamachandra
Thumak chalat raamachandra
Baajat painjaniyaan

Vidrum se arun adhar bolat mukh madhur madhur
Subhag naasikaa men chaaru latakat latakaniyaan

Thumak chalat raamachandra
Thumak chalat raamachandra
Baajat painjaniyaan
Tulasiidaas ati anand dekh ke mukhaaravind
Raghuvar chhabi ke samaan raghuvar chhabi baniyaan
Thumak chalat raamachandra
Thumak chalat raamachandra
Baajat painjaniyaan



--
Setu Gupta

Riste.................

चाचा चाची ,मोसा मोसी
भाई बहन
खो गए रिश्ते
साथ खो गई
सवेदना ,गरिमा रिश्तो कि
आज तू कल मैं
जानता नहीं
पहचानता नहीं
रिश्तो कि गरिमा खो रही है
इंसानियत बीच चोराहे रो रही है
अब कोन पहचान बानयेगा
चाचा चाची मोसा मोसी मामा कहलायेगा
जब एक लड़का एक लड़की
तो किसको चाचा ,किसको मोसी
कह बुलाएगा
वही दो देख मुश्किलों से पढाएगा
दो रुपए आमदनी
चार रुपए खर्चा
फिर कर्जा उठाएगा
समाज मे रहने के लिए
अपनी को ऊँचा दिखाने के लिए
बैंको से लिया लोन उतर नहीं पायेगा
थक हार एक दीन फांसी पे चढ़ जायेगा

--
Setu Gupta

Tuesday, April 07, 2009

"Kimat"

Kimat pani ki nhi pyas ki hoti hai,
Kimat maut ki nhi saans ki hoti hai,
Dost to bahut hote hai duniya me
Kimat dosti ki nhi vishwas ki hotihai

...........................

वो अजनबी न जाने क्या क्या सिखा गया
आंसू भरी आँखों को हंसना सिखा गया !!!!!

सुना कागज ,,,,,,पर अपना था दिल
चन्द लाम्हातों में ही इसे अपना बना गया !!

जिंदगी रौशन थी,खुशियों से भरी थी
किसी कंधे पर सर रखकर रोना सिखा गया !!

मै आवारा था पंछी कोई ठिकाना नहीं था
वो अपने दिल को मेरा आशियाना बता गया !!

उसकी आँखों में अजब सी एक बात तो थी
दिल तोड़ कर किसी को रुलाना सिखा गया !!

अब उसकी गली में अपना ये हाल है अजीब
खुद को कुछ नहीं,मुझे अपना दीवाना बता गया !!!!

Jai Hind..

सुरक्षा के डर से IPL मैच विदेश मे खेला जायेगा,
एक साल बाद ऐसा भी सुनोगे,
कि १५ अगस्त को
आतकंवाद के डर से
तिरंगा London मे लेहराया जायेगा….


वाकई..... “ मेरा भारत महान “

ज़िंदगी हमेशा पाने के लिए नही होती,

ज़िंदगी हमेशा पाने के लिए नही होती,
हर बात समझाने के लिए नही होती,
याद तो अक्सर आती है आप की,
लकिन हर याद जताने के लिए नही होती

महफिल न सही तन्हाई तो मिलती है,
मिलन न सही जुदाई तो मिलती है,
कौन कहता है मोहब्बत में कुछ नही मिलता,
वफ़ा न सही बेवफाई तो मिलती है

उमर की राह मे रस्ते बदल जाते हैं,
वक्त की आंधी में इन्सान बदल जाते हैं,
सोचते हैं तुम्हें इतना याद न करें,
लेकिन आंखें बंद करते ही इरादे बदल जाते हैं


कभी कभी दिल उदास होता है
हल्का हल्का सा आँखों को एहसास होता है
छलकती है मेरी भी आँखों से नमी
जब तुम्हारे दूर होने का एहसास होता

Sunday, April 05, 2009

पतित पवन नाम तीहारो

पतित पवन नाम तीहारो,
मुझको पावन कर दो |
पतझड़ जैसा जीवन मेरा,
उसको सावन कर दो |

चरण पड़ा हूँ विनती सुन लो,
पाप-ताप को हरना!
श्रद्धा तुम पर मेरी प्रभु जी
मान हमारा रखना |
कुलषित तन मन निर्मल होवे ,
ऐसा मुझको वर दो ||

पतित हुए हैं करम हमारे ,
अपना मुझे बना लो |
करे याचना ‘दास नारायण ‘
मुझको तुम अपना लो !
हे ! रघुनन्दन - बनो सहायक
मन में आनंद भर दो ||

जिन्दगी तुझको जिया है कोई अफ़सोस नहीं

जिन्दगी तुझको जिया है कोई अफ़सोस नहीं,
ज़हर ख़ुद मैंने पिया है कोई अफ़सोस नहीं,

मैंने मुजरिम को भी मुजरिम न कहा दुनिया में,
बस यही जुर्म किया है कोई अफ़सोस नहीं,

मेरी किस्मत में जो लिखे थे उन्ही काँटों से,
दिल के ज़ख्मों को सीया है कोई अफ़सोस नहीं,

अब गिरे संग के शीशों की हूँ बारिश,
अब कफ़न ओढ़ लिया है कोई अफ़सोस नहीं,

धुआं बनाके फिजां में उड़ा दिया मुझको

धुआं बनाके फिजां में उड़ा दिया मुझको,
मैं जल रहा था किसी ने बुझा दिया मुझको,

खड़ा हूँ आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए,
सवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझको,

सफेद रंग की चादर लपेट कर मुझ पर,
फसीने शहर से किसी ने सजा दिया मुझको,

मैं एक ज़रा बुलंदी को छूने निकला था,
हवा ने थम के ज़मीन पर गिरा दिया मुझको,

फिर उसी राहगुज़र पर शायद

फिर उसी राहगुज़र पर शायद,
हम कभी मिल सकें मगर शायद,

जान पहचान से क्या होगा,
फिर भी ऐ दोस्त गौर कर शायद,

मुन्तज़िर जिन के हम रहे उन को,
मिल गए और हमसफ़र शायद,

जो भी बिछडे हैं कब मिले हैं,
फिर भी तू इंतज़ार कर शायद,

सफर मे धुप तो होगी जो चल सको तो चलो

सफर मे धुप तो होगी जो चल सको तो चलो,
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो,

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती है,
तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो,

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता,
मुझे गिरा के अगर तुम संभल सको तो चलो,

यही है जिन्दगी कुछ ख्वाब चाँद उम्मीदें,
इन्ही खिलोनों से तुम भी बहल सको तो चलो,

तुम को हम दिल में बसा लेंगे तुम आओ तो सही

तुम को हम दिल में बसा लेंगे तुम आओ तो सही,
सारी दुनिया से छुपा लेंगे तुम आओ तो सही,

एक वादा करो अब हम से न बिछडोगे कभी,
नाज़ हम सारे उठा लेंगे तुम आओ तो सही,

बेवफा भी हो सितमगर भी जफ़ा पेशा भी,
हम खुदा तुम को बना लेंगे तुम आओ तो सही,

राह तारीक है और दूर है मंज़िल लेकिन,
दर्द की शमें जला लेंगे तुम आओ तो सही,

जिन्दगी तुने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं

जिन्दगी तुने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं,
तेरे दामन मैं मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं,

मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो,
मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं,

हम ने देखा है कई ऐसे खुदाओं को यहाँ,
सामने जिन के वो सच मुच का खुदा कुछ भी नहीं,

या खुदा अब के ये किस रंग में आई है बहार,
ज़र्द ही ज़र्द है पेडो पे हरा कुछ भी नहीं,

दिल भी एक जिद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह,
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं,



Really touch to my heart............................................

जिन्दगी तुने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं,
तेरे दामन मैं मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं,

मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो,
मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं,

तुम ये कैसे जुदा हो गए

तुम ये कैसे जुदा हो गए,
हर तरफ़ हर जगह हो गए,

अपना चेहरा न बदला गया,
आईने से खफा हो गए,

जाने वाले गए भी कहाँ,
चाँद सूरज घटा हो गए,

बेवफा तो न वो थे न हम,
यूं हुआ बस जुदा हो गए,

बेबसी जुर्म है हौसला जुर्म है

बेबसी जुर्म है हौसला जुर्म है,
ज़िंदगी तेरी एक-एक अदा जुर्म है,

ऐ सनम तेरे बारे में कुछ सोचकर,
अपने बारे में कुछ सोचना जुर्म है,

याद रखना तुझे मेरा एक जुर्म था,
भूल जाना तुझे दूसरा जुर्म है,

क्या सितम है के तेरे हसीन शहर में,
हर तरफ़ गौर से देखना जुर्म है,

दोस्ती जब किसी से की जाए

दोस्ती जब किसी से की जाए,
दुश्मनों की भी राय ली जाए,

मौत का ज़हर है फिजाओं में,
अब कहाँ जा के साँस ली जाए,

बस इसी सोच में हूँ डूबा हुआ,
ये नदी कैसे पार की जाए,

मेरे माजी के ज़ख्म भरने लगे,
आज फिर कोई भूल की जाए,

बोतलें खोल के तू पी बरसों,
आज दिल खोल के भी पी जाए,