धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो,
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो..............,
वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में,
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................,
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं,
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............,
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है,
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Wednesday, June 10, 2009
..............एक ग़ज़ल मेरी तुम्हारी
Kuch lafz hum kahe, kuch lafz tum kaho phir dono ke lafzon ko chalo milate hai aur phir likhte hai....... Ek Gazal meri-tumhari
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