Tuesday, May 17, 2011

चांद से फूल से या मेरी ज़ुबाँ से सुनिए

चांद से फूल से या मेरी ज़ुबाँ से सुनिए
हर तरफ आपका क़िस्सा हैं जहाँ से सुनिए

सबको आता नहीं दुनिया को सता कर जीना
ज़िन्दगी क्या है मुहब्बत की ज़बां से सुनिए

क्या ज़रूरी है कि हर पर्दा उठाया जाए
मेरे हालात भी अपने ही मकाँ से सुनिए

मेरी आवाज़ ही पर्दा है मेरे चेहरे का
मैं हूँ ख़ामोश जहाँ, मुझको वहाँ से सुनिए

चांद में कैसे हुई क़ैद किसी घर की ख़ुशी
ये कहानी किसी मस्ज़िद की अज़ाँ से सुनिए

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निदा फ़ाज़ली

Monday, May 16, 2011

By Gulzar

छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे
आँख लगाकर - कान बनाकर
नाक सजाकर
पगड़ी वाला,टोपी वाला
मेरा उपला
तेरा उपला
अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से
उपले थापा करते थे

हँसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर
गोबर के उपलों पे खेला करता था
रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था
हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे
किस उपले की बारी आयी
किसका उपला राख हुआ
वो पंडित था
इक मुन्ना था
इक दशरथ था
बरसों बाद मैं
श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ
आज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे में
इक दोस्त का उपला और गया!

- गुलज़ार

मैं

कुछ ढूंढ रहा था

पुरानी किताबों में

एक पुरानी तस्वीर

ना जाने कब की

ना जाने कहां से

मिल गयी मट्मैले

पन्नों के बीच

वो शक़्स जो मुझे

एक टक देख रहा था

पेहचाना सा लगा

मैं जानता था उस

बेफिक्र अंदाज़ को

उस बेबाकी को

उस शोखी को

उस मस्ती को

पर् सब से अलग थीं

वो आंखें जो मुझको

मेरे पार देख रही थीं

मेरे और उस अक्स के बीच

कितने बरस बीत गये थे

और घट गया था

ना जाने क्या कुछ

वो जो सोचा था

और वो भी जिसकी

कभी कल्पना तक न की थी

बार बार एक सवाल मन में उठ रहा था

आखिर क्या है जो सांझा है

मुझमें और मेरी इस तस्वीर में

सब कुछ तो बदल गया है

मैं कौन हूं ?

वो जो इस तस्वीर को देख रहा है

या वो जिसकी ये तस्वीर है …