हर तरफ आपका क़िस्सा हैं जहाँ से सुनिए
ज़िन्दगी क्या है मुहब्बत की ज़बां से सुनिए
मेरे हालात भी अपने ही मकाँ से सुनिए
मैं हूँ ख़ामोश जहाँ, मुझको वहाँ से सुनिए
ये कहानी किसी मस्ज़िद की अज़ाँ से सुनिए
..............निदा फ़ाज़ली
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो, ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो.............., वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में, क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................, पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं, अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............, फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है, वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
कुछ ढूंढ रहा था
पुरानी किताबों में
एक पुरानी तस्वीर
ना जाने कब की
ना जाने कहां से
मिल गयी मट्मैले
पन्नों के बीच
वो शक़्स जो मुझे
एक टक देख रहा था
पेहचाना सा लगा
मैं जानता था उस
बेफिक्र अंदाज़ को
उस बेबाकी को
उस शोखी को
उस मस्ती को
पर् सब से अलग थीं
वो आंखें जो मुझको
मेरे पार देख रही थीं
मेरे और उस अक्स के बीच
कितने बरस बीत गये थे
और घट गया था
ना जाने क्या कुछ
वो जो सोचा था
और वो भी जिसकी
कभी कल्पना तक न की थी
बार बार एक सवाल मन में उठ रहा था
आखिर क्या है जो सांझा है
मुझमें और मेरी इस तस्वीर में
सब कुछ तो बदल गया है
मैं कौन हूं ?
वो जो इस तस्वीर को देख रहा है
या वो जिसकी ये तस्वीर है …