Monday, May 16, 2011

मैं

कुछ ढूंढ रहा था

पुरानी किताबों में

एक पुरानी तस्वीर

ना जाने कब की

ना जाने कहां से

मिल गयी मट्मैले

पन्नों के बीच

वो शक़्स जो मुझे

एक टक देख रहा था

पेहचाना सा लगा

मैं जानता था उस

बेफिक्र अंदाज़ को

उस बेबाकी को

उस शोखी को

उस मस्ती को

पर् सब से अलग थीं

वो आंखें जो मुझको

मेरे पार देख रही थीं

मेरे और उस अक्स के बीच

कितने बरस बीत गये थे

और घट गया था

ना जाने क्या कुछ

वो जो सोचा था

और वो भी जिसकी

कभी कल्पना तक न की थी

बार बार एक सवाल मन में उठ रहा था

आखिर क्या है जो सांझा है

मुझमें और मेरी इस तस्वीर में

सब कुछ तो बदल गया है

मैं कौन हूं ?

वो जो इस तस्वीर को देख रहा है

या वो जिसकी ये तस्वीर है …

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