कुछ ढूंढ रहा था
पुरानी किताबों में
एक पुरानी तस्वीर
ना जाने कब की
ना जाने कहां से
मिल गयी मट्मैले
पन्नों के बीच
वो शक़्स जो मुझे
एक टक देख रहा था
पेहचाना सा लगा
मैं जानता था उस
बेफिक्र अंदाज़ को
उस बेबाकी को
उस शोखी को
उस मस्ती को
पर् सब से अलग थीं
वो आंखें जो मुझको
मेरे पार देख रही थीं
मेरे और उस अक्स के बीच
कितने बरस बीत गये थे
और घट गया था
ना जाने क्या कुछ
वो जो सोचा था
और वो भी जिसकी
कभी कल्पना तक न की थी
बार बार एक सवाल मन में उठ रहा था
आखिर क्या है जो सांझा है
मुझमें और मेरी इस तस्वीर में
सब कुछ तो बदल गया है
मैं कौन हूं ?
वो जो इस तस्वीर को देख रहा है
या वो जिसकी ये तस्वीर है …
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