Thursday, June 30, 2011

जैसे होती थी किसी दौर में, हैवानों में
बेसकूनी है वही आज के इंसानों में

जल्द उकताते हैं हर चीज़ से, हर मंजिल से
ये परिंदों की सी आदत भी है दीवानों में

उम्र भर सच के सिवा कुछ न कहेंगे, कह कर
नाम लिखवा लिया अब हमने भी नादानों में

जिस्म दुनिया में भी जन्नत के मज़े लेता रहा
रूह इक उम्र भटकती रही वीरानों में

उसकी मेहमान नवाजी की अदाएं देखीं
हम भी सकुचाए से बैठे रहे बेगानों में

नाम, सूरत तो हैं पानी पे लिखी तहरीरें
मेरी पहचान रहेगी मेरे अफसानों में

झूठ का ज़हर समाअत से उतर जाएगा
बूंद सच्चाई की उतरे तो मेरे कानों में

जो भी होना है वो निश्चित है, अटल है
क्यूँ न कश्ती को उतारे कभी तूफानों में.......................
बहुत बोरिंग है एक ही तरह रोज सुबह शाम होना...पता नहीं ई सूरज चाचू और चंदा मामा बोर होते हैं की नहीं....

भूख

आज फिर लगी अस्मत की बोली ,
आज फिर हुई इंसानियत शर्मसार .

नजरे झुकाये नियति को मान अपना नसीब ,
सो गयी इंसानियत ,मूक रह गयी ज़मी .

क्या आज भी ना उठ सकेगी उग्ली ,
क्या आज भी अंधरे कोने में चीखेगी अस्मत

कब तक रहेगा मोन फटा अम्बर का सीना ,
रो दिया वो भी दो घरी फिर हो गया मोन .

क्या था कसूर उसका क्यू मिली उसको दुत्कार ,
समाज के ठेकेदार ही बने इज्जत के ठेकेदार .

जाना सच तो तडप उठा इमान ,सो गये जज्बात ,
हर दोर में कोख के भूख की खातिर बना निवाला हैवानियत का .

आज फिर शर्मसार इंसानियत ,फिर शर्मसार इमान ,
तडपी तो बस भूख ,पलटी सिर्फ मज़बूरी !!

मकान तो सिर्फ सपने होते है

मकान तो सिर्फ सपने होते है

मकान तो सिर्फ सपने होते है
जिस में सिर्फ अपने रहते है
ऊची ऊची दीवारों का अपना ही महातम्य है
रोक लेती है बाँध लेती है अपनों को
समा लेती है सिमट लेती है सपनो को

कंहा छुपती है अपनों की खुशबु
दूर होते है परन्तु कराती है रूबरू
जब मकान मैं अपने रहते है जब ही पूरे सपने होते है
तब ही कमरे कमरे होते है
दालान ,आँगन और चौबारे होते है
वरना सुने सुने खिड़की और दरवाज़े होते है

वही तो खिड़की है वही तो दरवाजे है
कितना सूनापन है कितने सन्नाटे है
क्या मकान ईंट और चूने से होते है
क्या मकान लोहा लंगड़ और लकड़ी से होते है
नहीं मकान इन से हो सकते है सज सकते है बन सकते है
पर घर बीवी बच्चो और मात पिता और अपनों से होते है

हम मकान बनाते है ये लोग इसे घर बनाते है
सब चीज कितनी निर्जीव होती है
चारो तरफ कितनी उदासी फैली होती है
बच्चो की चिल्ल पो ,बीवी की खिट पिट
बड़ो का लड़ना उनकी ही चित और उनकी ही पुट

बर्तनों की झनझनाहट ,प्रेम की गर्माहट
थोड़ी सी झुंझलाहट थोड़ी सी लगावट
इन सब से ताप कर खिल कर घर बनता है
इन सब मैं इन का निश्छल प्यार छिपा रहता है
कैसे ये खो जाते है इनके जाते ही लुप्त हो जाता है

इनके आते ही घर मैं खुशिया लौट आती है
खिड़की दरवाजे हँसते है दीवारे खिल जाती है
घर मैं जिंदगानी लौट आती है ,नसों मैं रवानी लौट आती है
जाती हुई जवानी लौट आती है .फिर वही रोमानी कहानी लौट आती है

घर और परिवार का गहरा नाता है ,इनके बगेर रहा नहीं जाता है
मकान कितने भी बड़े हो इनके बगेर छोटे होते है
इनके होने से छोटे मकान भी बहुत बड़े और भरे होते है
कितनी यादे छिपी है इन में इनकी .जैसे प्राण बसे हो सांस हो अटकी

धड़कने बढ़ जाती है साँसे रुक जाती है इनके ना आने से
लौट आती है जिंदगानी जवानी इनके ही आने से
घर मैं रोनक है जीवन है इनके आने से ...
अब कोई शिकायत नहीं मुझे ज़माने से
घर मैं जो रहते है जो इस मैं बसते है वही अपने होते है

कितने भी बड़े हो घर इनके बगेर सिर्फ सपने होते है ...

अरविन्द भट्ट "अरविन्द"

ज़िन्दगी

आँसू हैं न मुस्कानें,
हिमानी झील के तट पर
अकेला गुनगुनाता हूँ।
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

यादें

तन्हा हो कभी तो मुझे ढूंढ लेना
इस दुनिया मैं नहीं अपने दिल से पूँछ लेना
आपके आसपास ही कंही रहते है हम
यादों से नहीं तो साथ गुज़ारे लम्हों से पूँछ लेना

Saturday, June 25, 2011

Good Morning Friends....

कभी कभी मै सोचता हूँ की .काश ऐसा हो की केवल गुड मोर्निंग ही ना हो....बल्कि धमाल हो.....कुछ चुनिन्दा दोस्त हो ,एक बंद कमरा हो ,जिसमे 5 .1 का सुपर बिजली की गति का संगीत हो..कमरे मे डिम नीली लाइट हो , शानदार खाना हो ...मस्त पंजाबी गाना हो .....या शम्मी कपूर का दौर हो, और बिंदास जम कर शानदार जैसा आये वैसा डांस हो ,डांस के साथ कोल्ड ड्रिंक* ....हो ,और लज़ीज़ खाना ,खाने के साथ मलाईदार दूध ...और उसके बाद शानदार मीठा पान ....काश ऐसा हो ....खान पान और गान .....तो उस दिन के क्या कहने ..दोस्तों के मेले कभी ना रहे अकेले....क्या ये सपना है ....है पर इतना सा खवाब है ...देखे कब पूरा होता है..........क्या कहते है दोस्तों..........ये ज़िंदगी में मेले कभी कम ना होंगे अफ़सोस हम ना होंगे....शुभ प्रभात दोस्तों साथ ही शुभ दिन ..


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जैसे होती थी किसी दौर में, हैवानों में
बेसकूनी है वही आज के इंसानों में

जल्द उकताते हैं हर चीज़ से, हर मंजिल से
ये परिंदों की सी आदत भी है दीवानों में

उम्र भर सच के सिवा कुछ न कहेंगे, कह कर
नाम लिखवा लिया अब हमने भी नादानों में

जिस्म दुनिया में भी जन्नत के मज़े लेता रहा
रूह इक उम्र भटकती रही वीरानों में

उसकी मेहमान नवाजी की अदाएं देखीं
हम भी सकुचाए से बैठे रहे बेगानों में

नाम, सूरत तो हैं पानी पे लिखी तहरीरें
मेरी पहचान रहेगी मेरे अफसानों में

झूठ का ज़हर समाअत से उतर जाएगा
बूंद सच्चाई की उतरे तो मेरे कानों में

जो भी होना है वो निश्चित है, अटल है
क्यूँ न कश्ती को उतारे कभी तूफानों में.......................

Saying...........

बहुत बोरिंग है एक ही तरह रोज सुबह शाम होना...पता नहीं ई सूरज चाचू और चंदा मामा बोर होते हैं की नहीं....

Like the touch of rain

Like the touch of rain she was
On a man's flesh and hair and eyes
When the joy of walking thus
Has taken him by surprise:

With the love of the storm he burns,
He sings, he laughs, well I know how,
But forgets when he returns
As I shall not forget her 'Go now'.

Those two words shut a door
Between me and the blessed rain
That was never shut before
And will not open again.

Rain

I hear leaves drinking rain;
I hear rich leaves on top
Giving the poor beneath
Drop after drop;
'Tis a sweet noise to hear
These green leaves drinking near.

And when the Sun comes out,
After this Rain shall stop,
A wondrous Light will fill
Each dark, round drop;
I hope the Sun shines bright;
'Twill be a lovely sight.

The first rain

The first rain reminds me
Of the rising summer dust.
The rain doesn't remember the rain of yesteryear.
A year is a trained beast with no memories.
Soon you will again wear your harnesses,
Beautiful and embroidered, to hold
Sheer stockings: you
Mare and harnesser in one body.

The white panic of soft flesh
In the panic of a sudden vision
Of ancient saints.

The Rainy Day

Sullen clouds are gathering fast over the black fringe of the forest.

O child, do not go out!

The palm trees in a row by the lake are smiting their heads against the dismal sky; the crows with their dragged wings are silent on the tamarind branches, and the eastern bank of the river
is haunted by a deepening gloom.
Our cow is lowing loud, ties at the fence.

O child, wait here till I bring her into the stall.
Men have crowded into the flooded field to catch the fishes as they escape from the overflowing ponds; the rain-water is running in rills through the narrow lanes like a laughing boy who
has run away from his mother to tease her.
Listen, someone is shouting for the boatman at the ford.

O child, the daylight is dim, and the crossing at the ferry is closed.
The sky seems to ride fast upon the madly rushing rain; the water in the river is loud and impatient; women have hastened home early from the Ganges with their filled pitchers.
The evening lamps must be made ready.

O child, do not go out!
The road to the market is desolate, the lane to the river is slippery. The wind is roaring and struggling among the bamboo branches like a wild beast tangled in a net.

..........................................by Rabindranath Tagore


WHEN the sun comes after rain

WHEN the sun comes after rain
And the bird is in the blue,
The girls go down the lane
Two by two.

When the sun comes after shadow
And the singing of the showers,
The girls go up the meadow,
Fair as flowers.

When the eve comes dusky red
And the moon succeeds the sun,
The girls go home to bed
One by one.

And when life draws to its even
And the day of man is past,
They shall all go home to heaven,
Home at last.

rain

rain
rain, rain, rain heal my heart that is broken apart
rain, rain, rain up above from the skies
rain, rain, rain pour here and clean my soul
rain, rain, rain there will be rain here, there will be rain there
rain, rain, rain wash away my pain

rain, rain, rain wash away my debts to pay

rain, rain, rain so tired i felt wash away my guilt
rain, rain i will do anything for you to cover my tears of shame

Friday, June 24, 2011

खा जाए..

हर बाल की खाल की यह चाल भी खा जाए..
इसके हाथ पढ़ जाए तो यह महीने साल भी खा जाए..
किसी बेहाल का बचा जो हाल भी हाल खा जाए..
बेमौत मरते मनन का यह मलाल खा जाए...

लालू का लाल खा जाए..
नक्सल बारी की नाल खा जाए..
बचपन का धमाल खा जाये..
बुढ़ापे की सहल खा जाये..
हया तोह छोड़ो बहेया की चाल भिया खा जाए..
अगर परोसा जा सके तोह ख्याल भी खा जाए..