आज फिर लगी अस्मत की बोली ,
आज फिर हुई इंसानियत शर्मसार .
नजरे झुकाये नियति को मान अपना नसीब ,
सो गयी इंसानियत ,मूक रह गयी ज़मी .
क्या आज भी ना उठ सकेगी उग्ली ,
क्या आज भी अंधरे कोने में चीखेगी अस्मत
कब तक रहेगा मोन फटा अम्बर का सीना ,
रो दिया वो भी दो घरी फिर हो गया मोन .
क्या था कसूर उसका क्यू मिली उसको दुत्कार ,
समाज के ठेकेदार ही बने इज्जत के ठेकेदार .
जाना सच तो तडप उठा इमान ,सो गये जज्बात ,
हर दोर में कोख के भूख की खातिर बना निवाला हैवानियत का .
आज फिर शर्मसार इंसानियत ,फिर शर्मसार इमान ,
तडपी तो बस भूख ,पलटी सिर्फ मज़बूरी !!
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