Thursday, June 30, 2011

मकान तो सिर्फ सपने होते है

मकान तो सिर्फ सपने होते है

मकान तो सिर्फ सपने होते है
जिस में सिर्फ अपने रहते है
ऊची ऊची दीवारों का अपना ही महातम्य है
रोक लेती है बाँध लेती है अपनों को
समा लेती है सिमट लेती है सपनो को

कंहा छुपती है अपनों की खुशबु
दूर होते है परन्तु कराती है रूबरू
जब मकान मैं अपने रहते है जब ही पूरे सपने होते है
तब ही कमरे कमरे होते है
दालान ,आँगन और चौबारे होते है
वरना सुने सुने खिड़की और दरवाज़े होते है

वही तो खिड़की है वही तो दरवाजे है
कितना सूनापन है कितने सन्नाटे है
क्या मकान ईंट और चूने से होते है
क्या मकान लोहा लंगड़ और लकड़ी से होते है
नहीं मकान इन से हो सकते है सज सकते है बन सकते है
पर घर बीवी बच्चो और मात पिता और अपनों से होते है

हम मकान बनाते है ये लोग इसे घर बनाते है
सब चीज कितनी निर्जीव होती है
चारो तरफ कितनी उदासी फैली होती है
बच्चो की चिल्ल पो ,बीवी की खिट पिट
बड़ो का लड़ना उनकी ही चित और उनकी ही पुट

बर्तनों की झनझनाहट ,प्रेम की गर्माहट
थोड़ी सी झुंझलाहट थोड़ी सी लगावट
इन सब से ताप कर खिल कर घर बनता है
इन सब मैं इन का निश्छल प्यार छिपा रहता है
कैसे ये खो जाते है इनके जाते ही लुप्त हो जाता है

इनके आते ही घर मैं खुशिया लौट आती है
खिड़की दरवाजे हँसते है दीवारे खिल जाती है
घर मैं जिंदगानी लौट आती है ,नसों मैं रवानी लौट आती है
जाती हुई जवानी लौट आती है .फिर वही रोमानी कहानी लौट आती है

घर और परिवार का गहरा नाता है ,इनके बगेर रहा नहीं जाता है
मकान कितने भी बड़े हो इनके बगेर छोटे होते है
इनके होने से छोटे मकान भी बहुत बड़े और भरे होते है
कितनी यादे छिपी है इन में इनकी .जैसे प्राण बसे हो सांस हो अटकी

धड़कने बढ़ जाती है साँसे रुक जाती है इनके ना आने से
लौट आती है जिंदगानी जवानी इनके ही आने से
घर मैं रोनक है जीवन है इनके आने से ...
अब कोई शिकायत नहीं मुझे ज़माने से
घर मैं जो रहते है जो इस मैं बसते है वही अपने होते है

कितने भी बड़े हो घर इनके बगेर सिर्फ सपने होते है ...

अरविन्द भट्ट "अरविन्द"

No comments: