Tuesday, May 05, 2009

दस्तक - *****

सुबह सुबह इक ख्वाब कि दस्तक पर दरवाज़ा खोला,
देखा सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आये हैं
आंखों से मायूस थे सारे

चेहरे सारे सुने सुनाये
पांव धोये, हाथ धुलाये
आंगन में आसन लगवाये।।।
और तन्दूर पे मक्की के कुछ मोटे मोटे रोटे पकाये
पोटली में मेहमान मेरे
पिछले सालों की फ़सलों का गुड़ लाये थे

आंख खुली तो देखा घर में कोई नहीं था
हाथ लगकर देखा तो तन्दूर अभी तक बुझा नहीं था
और होथों पे मीठे गुड़ का ज़ायका अब तक चिपक रहा था

ख्वाब था शायद!
ख्वाब ही होगा! !
सरहद पर कल रात, सुना है, चली थी गोली
सरहद पर कल रात, सुना है
कुछ ख्वाबों का खून हुआ है

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