Sunday, May 10, 2009

पतझड़ की पगलाई धूप

भोर भई जो आँखें मींचे
तकिये को सिरहाने खींचे
लोट गई इक बार पीठ पर
ले लम्बी जम्हाई धूप
अनमन सी अलसाई धूप

पोंछ रात का बिखरा काजल
सूरज नीचे दबा था आंचल
खींच अलग हो दबे पैर से
देह आंचल सरकाई धूप
यौवन ज्यों सुलगाई धूप

फुदक फुदक खेले आंगन भर
खाने-खाने एक पांव पर
पत्ती-पत्ती आंख मिचौली
बचपन सी बौराई धूप
पतझड़ की पगलाई धूप

No comments: