धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो,
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो..............,
वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में,
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................,
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं,
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............,
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है,
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Tuesday, May 05, 2009
दीवान-ए-ग़ालिब
थी खबर गर्म कि ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्ज़े देखने हम भी गए थे, पर तमाशा ना हुआ
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पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन है कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या
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इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया वरना हम भी आदमी थे काम के
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