धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो,
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो..............,
वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में,
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................,
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं,
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............,
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है,
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Wednesday, May 06, 2009
ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा क़ाफिला साथ और सफर तन्हा
अपने साये से चौंक जाते हैं उम्र गुज़री है इस कदर तन्हा
रात भर बोलते हैं सन्नाटे रात काटे कोई किधर तन्हा
दिन गुज़रता नहीं है लोगों में रात होती नहीं बसर तन्हा
हमने दरवाज़े तक तो देखा था फिर न जाने गए किधर तन्हा
No comments:
Post a Comment