धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो,
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो..............,
वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में,
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................,
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं,
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............,
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है,
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Sunday, May 10, 2009
वादे .........
आदतन तुम ने कर िदये वादे आदतन हम ने ऐतबार िकया
तेरी राहों में हर बार रुक कर हम ने अपना ही इन्तज़ार िकया
अब ना माँगेंगे िजन्दगी या रब ये गुनाह हम ने एक बार िकया
No comments:
Post a Comment