Tuesday, May 05, 2009

नज़म उलझी हुई है सीने में...

नज़म उलझी हुई है सीने में,
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर,
उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह,
लफ़्ज़ कागज़ पे बैठते ही नहीं,
कब से बैठा हूं मैं जानम,
सादे कागज़ पे लिखके नाम तेरा,

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है,
इससे बहतर भी नज़्म कया होगी।।

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