रब हो साजिश में शामिल तो क्या कीजिए ,
मौत बन जाए साहिल तो क्या कीजिए
उसके शानो पर रोना हुआ है फज़ूल ,
मेरा साजन है गाफिल तो क्या कीजिए
दर्द कहने का अंदाज़ है बस जुदा ,
गर जो थम जाए महफ़िल तो क्या कीजिए
तुम ने पाई बुलंदी नई भी तो क्या ,
हो खुशी ही न हासिल तो क्या कीजिए
फूल ही फूल थे इस फ़िज़ा में खिले
मैं ही काँटों के काबिल तो क्या कीजिए
सूखा फिर भी नहीं है, दरख़्त -ए- वफ़ा
गर हो मौसम ही बोझिल तो क्या कीजिए
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो, ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो.............., वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में, क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................, पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं, अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............, फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है, वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Tuesday, September 15, 2009
रब हो साजिश में शामिल तो क्या कीजिए
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