घटा से घिर गयी बदली, नज़र नहीं आती
बहा ले नीर तू उजली, नज़र नहीं आती
हवा में शोर ये कैसा सुनाई देता है
कहीं पे गिर गयी बिजली नज़र नहीं आती
है चारों ओर नुमाइश के दौर जो यारों
दुआ भी अब यहाँ असली नज़र नहीं आती
चमन में खार ने पहने, गुलों के चेहरे हैं
कली कोई कहाँ, कुचली नज़र नही आती
पहाड़ों से गिरा झरना तो यूँ ज़मीं बोली
ये दिल की पीर थी पिघली नज़र नही आती
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो, ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो.............., वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में, क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................, पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं, अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............, फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है, वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Tuesday, September 15, 2009
नज़र नहीं आती
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment