धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो,
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो..............,
वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में,
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................,
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं,
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............,
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है,
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Tuesday, September 15, 2009
अच्छी है यही खुद्दारी क्या
अच्छी है यही खुद्दारी क्या रख जेब में दुनियादारी क्या
जो दर्द छुपा के हंस दे हम अश्कों से हुई गद्दारी क्या
हंस के जो मिलो सोचे दुनिया मतलब है, छुपाया भारी क्या
वे देह के भूखे, क्या जाने ये प्यार वफ़ा दिलदारी क्या
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