Monday, April 27, 2009

आंख से हम जब कभी आंसू बहाने लग गए
बारहा फिर आप हमको याद आने लग गए

वक़्त पर मिलता नहीं है कोई भी अपने करीब
अपने अपने काम में सारे दीवाने लग गए

हमसे तुमसे जो हुई है जाने अनजाने खता
बस इसी उलझन को सुलझाते ज़माने लग गए

हम इन्ही ख्वाबों ख्यालों में ही डूबे रह गए
क्या पता कब चान्द तारे मुस्कराने लग गए

बस हमें तो रोज का अखबार समझा आपने
पढ़ लिया फिर रख दिया कुछ गुनगुनाने लग गए

इस तरह जज्बात ने झकझोड़ कर दिल रख दिया
आप शीशा तोड़कर क्यूं मुस्कराने लग गए

जब कभी सोने के पिंजरे में घुटा तोते का दम
बाग के सारे नज़ारे याद आने लग गए.........

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Setu Gupta

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