धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो,
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो..............,
वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में,
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................,
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं,
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............,
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है,
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Friday, April 03, 2009
वो रुलाकर हंस न पाया देर तक
वो रुलाकर हंस न पाया देर तक, जब मैं रो कर मुस्कुराया देर तक,
भूलना चाहा अगर उसको कभी, और भी वो याद आया देर तक,
भूखे बच्चों की तसल्ली के लिए, माँ ने फिर पानी पकाया देर तक,
गुनगुनाता जा रहा था इक फकीर, धुप रहती है न साया देर तक,
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