धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो,
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो..............,
वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में,
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................,
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं,
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............,
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है,
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Sunday, April 05, 2009
कैसे कैसे हादसे सहते रहे
कैसे कैसे हादसे सहते रहे, हम यूँही जीते रहे हँसते रहे,
उसके आ जाने की उम्मीदें लिए, रास्ता मुड़ मुड़ के हम तकते रहे,
वक्त तो गुजरा मगर कुछ इस तरह, हम चरागों की तरह जलते रहे,
कितने चेहरे थे हमारे आस-पास, तुम ही तुम दिल में मगर बसते रहे,
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