धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो,
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो..............,
वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में,
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................,
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं,
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............,
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है,
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Friday, April 03, 2009
जब भी तन्हाई से घबरा के सिमट जाते हैं
जब भी तन्हाई से घबरा के सिमट जाते हैं, हम तेरी याद के दामन से लिपट जाते हैं,
उन पे तूफान को भी अफ़सोस हुआ करता है, वो सफिने जो किनारों पे उलट जाते हैं,
हम तो आए थे रहें साख में फूलों की तरह, तुम अगर हार समझते हो तो हट जाते हैं,
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