धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो,
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो..............,
वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में,
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................,
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं,
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............,
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है,
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Wednesday, March 10, 2010
मेरी दीवानगी
साथ जीने मरने की कसमे खाते थे अब मिलने से भी कतराते है वो ... पलो मे छोड़ दिया हाथ मेरा सात जन्मो साथ बतलाते थे वो मेरी दीवानगी पर मर मिटने वाले अब बड़े अंदाज से बेगाना बता मुस्कराते है वो
1 comment:
bahut sundar abhivyakti
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