बस एक लम्हे का जगड़ा था,
दरो ओ दीवार पे ऐसे छानके से गिरी आवाज़
जैसे कॉच गिरता है................
हर एक शये मे गयी
उड़ती हुई जलती हुई किरचे
नज़र में, बात में, लहजे में,
सोच और साँस के अंदर
लहू होना था एक रिश्ते का
सो वो हो गया उस दिन
उसी आवाज़ के टुकड़े उठा के फ़र्श से
किसी ने काट ली नब्ज़
न की आवाज़ तक कुछ भी..
कि कोई जाग न जाये
बस
एक लम्हे का जगड़ा था
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