Sunday, August 07, 2011

मेरे प्यारे कमीनो दोस्तों के नाम..

सबसे पहले तो आप सभी को फ्रेंडशिप डे की हार्दिक शुभकामनाएँ...
आप हमेशा खुश रहे और यू ही सदा मुस्कुराते रहे, गुनगुनाते रहे और हम सबको हँसाते रहे.... आप पर आपके अपनों का साथ हमेशा बना रहे यही दुआ है हमारी !!!

आज बैठे बैठे यूँ ही ज़िन्दगी की किताब के कुछ वर्क पलटे तो कुछ धुंधले से चेहरे ज़हन में आये... बचपन के कुछ दोस्त और उनके साथ की गयी ढेरों शरारतें... गर्मियों की दोपहर में वो स्कूल से लौटना और घर के सामने वाले ख़ाली मैदान में लगे शहतूत के पेड़ से तोड़ तोड़ के कच्चे-पक्के शहतूत खाना और फिर पूरी स्कूल यूनिफ़ॉर्म में उसके दाग़ लग जाने पर माँ से डाट खाना :-) सच ! क्या दिन थे वो...

फिर कुछ और वर्क पलटे और कुछ और चेहरे सामने आये... स्कूल-कॉलेज में साथ में पढ़ने वाले वो तमाम साथी... वो दोस्त जिनके बिना शायद कल एक पल भी नहीं कटता था और आज उनमें से जाने कितने दोस्त ऐसे हैं जिनसे अब कोई संपर्क तक नहीं है... पता नहीं कहाँ होंगे... कैसे होंगे... क्या उन्हें भी ऐसे ही कभी हमारी याद आती होगी... क्या पता...

ज़िन्दगी में कुछ बनने की ख़्वाहिश, कुछ कर दिखाने की चाह... नाम, पैसा, दौलत, शोहरत सब कुछ पाने की इक्षा में हम सब कितना आगे बढ़ जाते हैं... इतना की पीछे मुड़ के देखने का भी समय नहीं होता... ये सब पाने की चाह रखना ग़लत है ये नहीं कहुगा... एक अच्छी ख़ुशहाल ज़िन्दगी के लिये ये सब भी बहुत ज़रूरी है... लेकिन इस सबको हासिल करने की जद्दोजहद में अपने साथियों को, अपने रिश्तों को भूल जाना ये ग़लत है... सफलता के उस अर्श पर अगर आपके अपने ही साथ ना हुए तो ख़ुशियाँ अधूरी ही रह जायेंगी... बेमानी... बेमतलब...

समय के साथ हम तो आगे बढ़ जाते हैं पर पीछे रह जाती है कुछ यादें... अपनों के साथ बिताये कुछ ख़ूबसूरत लम्हों की... हालांकि दोस्त तो सभी ख़ास होते हैं लेकिन हर किसी से आपकी दोस्ती उतनी गहरी उतनी ख़ास नहीं होती... बाकी सबका हालचाल मिलता रहे बस, दिल उतने में ही ख़ुश रहता है पर जब आपका कोई ख़ास दोस्त जिसके बिना शायद आप कुछ पल भी नहीं बिताते, वो दोस्त कुछ समय के लिये भी आपसे दूर जाता है तो उसकी कमी अखरती है... लगता है ज़िन्दगी में कुछ अधूरापन है... जैसे आपका कोई बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा आपसे अलग हो गया है...

जब भी दोस्ती की बातें होती हैं तो बचपन के दोस्त और किस्से हमेशा याद आते हैं। लेकिन वे दोस्त जिनके कारण ये किस्से बुने जाते हैं उनका हाथ जिंदगी की दौड़ में कहीं छूट जाता है। इस बार का फ्रेंडशिप डे, ऐसे ही कुछ दोस्तों के नाम जो कि इस भागती हुई ज़िन्दगी में, जाने अनजाने में हमसे कहीं दूर चले गए. या यू कहे हमसे ही हाथ छुट गया..

मेरा मानना है कि दोस्त, नए पुराने.. आछे बुरे .. नहीं होते.. दोस्त दोस्त होते है.. जो कि हमें हर पल जीने कि नयी राह देखते है..

पुराने दोस्त और दोस्ती हमारे पुराने गांव की तरह होते हैं.. बरसों बाद जब हम फ़िर उनसे मिलते हैं तो कुछ बदल जाते हैं, लेकिन बहुत कुछ पहले की तरह ही होते हैं..

दोस्तों, दोस्त एक आदत से होते है.. जो कि हमारे साथ ना हो तो दिन ही पूरा नहीं होता..
हम्म... ये आदतें (दोस्त) भी ना
सच में अजीब होती हैं...
हमको भी ये हसीन आदत पालने की आदत सी हो गयी है..


ऐसे ही किसी दोस्त को याद कर के गुलज़ार साब ने ये नज़्म लिखी होगी शायद...

मैं कुछ-कुछ भूलता जाता हूँ अब तुझको
तेरा चेहरा भी धुँधलाने लगा है अब तख़य्युल में
बदलने लग गया है अब वह सुबह शाम का मामूल
जिसमें तुझसे मिलने का भी एक मामूल शामिल था

तेरे ख़त आते रहते थे
तो मुझको याद रहते थे
तेरी आवाज़ के सुर भी
तेरी आवाज़, को काग़ज़ पे रखके
मैंने चाहा था कि पिन कर लूँ
कि जैसे तितलियों के पर लगा लेता है कोई अपनी एलबम में

तेरा बे को दबा कर बात करना
"वाओ" पर होठों का छल्ला गोल होकर घूम जाता था
बहुत दिन हो गए देखा नहीं
ना ख़त मिला कोई
बहुत दिन हो गए सच्ची
तेरी आवाज़ की बौछार में भीगा नहीं हूँ मैं

गुलज़ार साब ने की ही कलम-
एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी
यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं
कितनी सौंधी लगती है तब माँझी की रुसवाई भी


कुछ भी कहो.. दोस्तों, तेडा है लेकिन मेरा है..और मै इन सबका दीवाना हूँ |

दोस्ती, हां जी दोस्ती, यही तो है जिसने हम सब को एक में पिरोके रखा है.. क्या कहते हो कमीनो.....

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सेतु गुप्ता (०७-अगस्त-२०११ - मुंबई)

1 comment:

Anonymous said...

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