धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो,
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो..............,
वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में,
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................,
पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं,
अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............,
फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है,
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Tuesday, August 31, 2010
दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई
दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई, जैसे एहसान उतारता है कोई,
आईना देखकर तसल्ली हुई, हमको इस घर मैं जानता है कोई,
पक गया है शजर पे फल शायद, फिर से पत्थर उछालता है कोई,
देर से गूंजते हैं सन्नाटे, जैसे हमको पुकारता है कोई|
3 comments:
दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई,
जैसे एहसान उतारता है कोई,
बहुत सुन्दर शब्द.............
सभी शेर बड़ी सादगी से भावों को संप्रेषित करते है ...सुन्दर ग़ज़ल|..
ब्रह्मांड
वाह वाह , सभी शेर देर तक गूँज रहे हैं ।
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