Tuesday, August 31, 2010

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई,
जैसे एहसान उतारता है कोई,

आईना देखकर तसल्ली हुई,
हमको इस घर मैं जानता है कोई,

पक गया है शजर पे फल शायद,
फिर से पत्थर उछालता है कोई,

देर से गूंजते हैं सन्नाटे,
जैसे हमको पुकारता है कोई|

3 comments:

Anamikaghatak said...

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई,
जैसे एहसान उतारता है कोई,


बहुत सुन्दर शब्द.............

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) said...

सभी शेर बड़ी सादगी से भावों को संप्रेषित करते है ...सुन्दर ग़ज़ल|..
ब्रह्मांड

शारदा अरोरा said...

वाह वाह , सभी शेर देर तक गूँज रहे हैं ।