धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो, ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो.............., वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में, क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो................, पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं, अपने घर के दरोदीवार सजा कर देखो............, फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है, वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो...............
Wednesday, July 20, 2011
खुशियों
हम बड़ी खुशियों के लिए छोटे छोटे खुशियों के पलों को अहमियत नहीं देते. मगर जब अंत में मंथन करते हैं तो यही लगता है कि सुकून तो एक छोटी सी ख़ुशी में भी हो सकता है, अगर वह हमें अन्दर से महसूस हुई है तो....मैं तो यही कहूँगा... . मैं उम्र भर सोचा कि मेरा सफ़र क्या था, जो जिंदगी भर किया, वो बसर क्या था, आज मीठी सी नींद आई तो पता चला, कि उस मुस्कराहट में असर क्या था."
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