Sunday, July 10, 2011

कुछ सवाल ज़िन्दगी से...

दिवाली अब बस कुछ ही दिन दूर है... आप सबके घरों की तरह हमारे यहाँ भी थोड़ी बहुत तैयारियां शुरू हो गयी हैं गणेश जी और लक्ष्मी जी के स्वागत के लिये... और इस सप्ताहंत का उपयोग हमने कुछ साफ़ सफाई कर के किया :-) ... आज नंबर आया हमारे कमरे का... अलमारी साफ़ करते हुए एक पुरानी डायरी हाथ लगी... शायद कोई दस-बारह साल पुरानी... वैसे तो इस डायरी का ज़िक्र हमने अपनी पहली पोस्ट में भी करा था... शायद ये ब्लॉग बनाने की प्रेरणा भी वही डायरी है... बचपन से आदत रही है जो भी कवितायें, नज्में या विचार पसंद आया उसी डायरी में नोट करती आई हूँ... आज इतने दिनों बाद हाथ लगी तो अनायास ही कुछ पन्ने पलट लिये... तमाम बड़े बड़े नामी गिरामी शायरों की रचनाओं के बीच एक बचकानी सी कविता मिली... नहीं... कविता कहना शायद सही नहीं होगा... हमें खुद ही नहीं पता की वो है क्या... कुछ विचार हैं बस, कुछ सवाल जो ऐसे ही कभी मन में आये थे और लिख दिया था... और लिख कर भूल भी गए थे... आज इतने सालों बाद पढ़ा तो सोचा आप सब के साथ शेयर कर लूँ...
बात उन दिनों की है जब स्कूल से निकल कर यूनीवर्सिटी में दाखिला लिया था... अचानक से लगने लगा था हम भी बड़े हो गए हैं... पर शायद मन में तब भी बचपना था... हर चीज़ "परफेक्ट" नज़र आती थी, पर तमाम रिश्तों के मायने समझ नहीं आते थे... कोई बेवजह ही क्यूँ अच्छा लगता था और कोई कितना भी अच्छा हो फिर भी उससे कभी बनती क्यूँ नहीं थी... किसी से घंटों बात करना क्यूँ अच्छा लगता था... ज़रा सी देर होने पर क्यूँ माँ-बाबा परेशान हो जाते थे... बिना बताये कहीं जाने पर डांट क्यूँ पड़ती थी... हर किसी को हर बात की सफाई क्यूँ देनी पड़ती थी... माँ-बाबा के मन में हर समय ये डर क्यूँ रहता था की कुछ भी लीक से हट कर किया तो समाज क्या कहेगा... कौन है ये समाज ? किसने बनाए इसके नियम कायदे ? कौन चलाता है इसे ? ऐसे ही ढेरों सवाल मन में हर समय चला करते थे, पर जवाब नहीं थे...
आज इतने सालों के बाद शायद रिश्तों को, उनके मायनों को तो थोड़ा बहुत समझने लगे हैं... पर सवाल अब भी वही हैं... जवाब आज भी नहीं मिले...


क्या ज़रूरी है हर रिश्ते को इक नाम देना
उसे सीमाओं के धागों से बाँध देना
क्या हम भी उन परिंदों की तरह
आस्मां में पंख फैला कर नहीं उड़ सकते
आज़ाद, बेफिक्र...
क्या हमारे लिये इतना काफी नहीं है कि हम जान लें
हम सही हैं या ग़लत
क्या ज़रूरी है कि हम सारी दुनियाँ के लिये जवाबसार हों
अगर ऐसा है तो ऐसा क्यूँ है ?
किसने बनाए ये नियम ?
भगवान ने ?
ख़ुदा ने ?
प्रकृति ने ?
नहीं.
इंसान ने !
फिर क्यूँ इंसान ही इंसान के बनाए हुए नियमों पर नहीं चलना चाहता ?
क्यूँ बार बार इन्हें तोड़ कर आज़ाद हो जाना चाहता है ?
क्यूँ ?

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