Sunday, July 10, 2011


वक़्त की नाव में बैठ कर
आओ चलें कुछ दूर
समय से परे

वहाँ,
जहाँ सूरज सदा चमकता है
फिर भी तपता नहीं
सिर्फ़ बिखेरता है
झिलमिल सी रश्मियाँ
जो ठंडक पहुंचाती हैं मन को...

वहाँ,
जहाँ कोई शोर गुल नहीं है
सिर्फ़ भीनी सी सरगोशियाँ हैं
हवाओं के कंगन की
पानियों की झांझर की
और मीलों फैले सुकून की...

वहाँ,
जहाँ समय थम जाता है
"तुम" और "मैं" का भ्रम मिट जाता है
बस वो एक लम्हा
जिसमे सिर्फ़ "हम" हों
एकाकार...

और फिर वक़्त की शाख़ से
तोड़ के उस लम्हें को
क़ैद कर के मुट्ठी में
नक्श कर के ज़हन में
समय के दायरे में
लौट आयेंगे...

-- ऋचा

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