Thursday, July 07, 2011

खिड़की

खिड़की ये सोने न दे रे
रात भर मुझे जग्गाये रे
सपनों को करवटों को
यादों को उल्खानों को
रात भर फिर जगाये रे

आँख बांध करना चाहूं रे
याद तेरी फिर सताए रे
किस्सों के काफिलों का
राहों का मनिलों का
कारवां चलता जाए रे

खिड़की ये सोने न दे रे
रात भर मुझे जग्गाये रे
खिड़की ये सोने न दे रे

आ भी जा, आ भी जाना रे,
आँखों में बस भी जाना रे
दिल में तोड़ी ख़ामोशी
हलकी सी फून्ख दे, आजारे...

जब पवन झोंका लाये रे
बीता कल फिर जगाये रे
चाँद में सितारों में
नींद के बाजारों में
आहटें बढती जाएरे

खिड़की ये सोने न दे रे
रात भर मुझे जग्गाये रे
खिड़की ये सोने न दे रे

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