ना आमद की आहट और ना जाने की टोह मिलती है
कब आते हो
कब जाते हो ...
ईमली का ये पेड़ हवा में हिलता है तो
ईंटों की दीवार पे परछाईं का छींटा पड़ता है
और जज़्ब हो जाता है, जैसे,
सूखी मिट्टी पे कोई पानी के कतरे फेंक गया हो
धीरे धीरे आँगन में फिर धूप सिसकती रहती है
कब आते हो
कब जाते हो
दिन में कितनी बार मुझे तुम याद आते हो ...
बंद कमरे में कभी कभी
जब दिए की लौ हिल जाती है तो
एक बड़ा सा साया मुझको
घूँट घूँट पीने लगता है
आँखें मुझसे दूर बैठ के मुझको देखती रहती हैं
कब आते हो
कब जाते हो
दिन में कितनी बार मुझे तुम याद आते हो ...
ना आमद की आहट और ना जाने की टोह मिलती है
कब आते हो
कब जाते हो
दिन में कितनी बार मुझे तुम याद आते हो ...
-- गुलज़ार
No comments:
Post a Comment